श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
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दो०— कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय॥ २५१॥
परन्तु धनुषको तोड़कर मनोहर कन्या, बड़ी विजय और अत्यन्त सुन्दर कीर्तिको पानेवाला मानो ब्रह्मणे किसीको रचा ही नहीं॥ २५१॥
कहहु काहि यहु लाभु न भावा । काहुँ न संकर चाप चढ़ावा॥ रहउ चढ़ाउब तोरब भाई । तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई॥
कहिये, यह लाभ किसको अच्छा नहीं लगता। परन्तु किसीने भी शङ्करजीका धनुष नहीं चढ़ाया। अरे भाई! चढ़ाना और तोड़ना तो दूर रहा, कोई तिलभर भूमि भी छुड़ा न सका॥ १॥
अब जनि कोउ माखै भट मानी । बीर बिहीन मही मैं जानी॥ तजहु आस निज निज गृह जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥
अब कोई वीरताका अभिमानी नाराज न हो। मैंने जान लिया, पृथ्वी वीरोंसे खाली हो गयी। अब आशा छोड़कर अपने-अपने घर जाओ; ब्रह्मणे सीताका विवाह लिखा ही नहीं॥ २॥
सुकृतु जाइ जौँ पनु परिहरऊँ । कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ॥ जौँ जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई । तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई॥
यदि प्रण छोड़ता हूँ तो पुण्य जाता है; इसलिये क्या करूँ, कन्या कुँआरी ही रहे। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरोंसे शून्य है, तो प्रण करके उपहासका पात्र न बनता॥ ३॥
जनक बचन सुनि सब नर नारी । देखि जानकिहि भए दुखारी॥ माखे लखनु कुटिल भई भौहैं । रदपट फरकत नयन रिसौहैं॥
जनकके वचन सुनकर सभी स्त्री-पुरुष जानकीजीकी ओर देखकर दुःखी हुए, परन्तु लक्ष्मणजी तमतमा उठे, उनकी भौहैं टेढ़ी हो गयीं, ओठ फड़कने लगे और नेत्र क्रोधसे लाल हो गये॥ ४॥
दो०— कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान॥ २५२॥
श्रीरघुवीरजीके डरसे कुछ कह तो सकते नहीं, पर जनकके वचन उन्हें बाण-से लगे। [जब न रह सके तब] श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें सिर नवाकर वे यथार्थ वचन बोले—॥ २५२॥
रघुबंसिन्ह महूँ जहँ कोउ होई । तेहिँ समाज अस कहइ न कोई॥ कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुलमनि जानी॥
रघुवंशियोंमें कोई भी जहाँ होता है, उस समाजमें ऐसे वचन कोई नहीं कहता, जैसे अनुचित वचन रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजीको उपस्थित जानते हुए भी जनकजीने कहे हैं॥ १॥