श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
अच्छी तरह नेत्र भरकर श्रीरामजीकी शोभा देखकर, फिर पिताके प्रणका स्मरण करके सीताजीका मन क्षुब्ध हो उठा। [वे मन-ही-मन कहने लगीं—] अहो! पिताजीने बड़ा ही कठिन हठ ठाना है, वे लाभ-हानि कुछ भी नहीं समझ रहे हैं ॥ १ ॥
सचिव सभय सिख देड़ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई ॥ कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ॥
मन्त्री डर रहे हैं; इसलिये कोई उन्हें सीख भी नहीं देता, पण्डितोंकी सभामें यह बड़ा अनुचित हो रहा है। कहाँ तो वत्रसे भी बढ़कर कठोर धनुष और कहाँ ये कोमलशरीर किशोर श्यामसुन्दर! ॥ २ ॥
बिधि केहि भाँति धरौँ उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ॥ सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी ॥
हे विधाता! मैं हृदयमें किस तरह धीरज धरूँ, सिरसके फूलके कणसे कहीं हीरा छेदा जाता है। सारी सभाकी बुद्धि भोली (बावली) हो गयी है, अतः हे शिवजीके धनुष! अब तो मुझे तुम्हारा ही आसरा है ॥ ३ ॥
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ॥ अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सय सम जाहीं ॥
तुम अपनी जड़ता लोगोंपर डालकर, श्रीरघुनाथजी [के सुकुमार शरीर] को देखकर [उतने ही] हलके हो जाओ। इस प्रकार सीताजीके मनमें बड़ा ही सन्ताप हो रहा है। निमेषका एक लव (अंश) भी सौ युगोंके समान बीत रहा है ॥ ४ ॥
दो०— प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल। खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल ॥ २५८ ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखकर फिर पृथ्वीकी ओर देखती हुई सीताजीके चञ्चल नेत्र इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो चन्द्रमण्डलरूपी डोलमें कामदेवकी दो मछलियाँ खेल रही हों ॥ २५८ ॥
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी ॥ लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसँ परम कूपन कर सोना ॥
सीताजीकी वाणीरूपी भ्रमरीको उनके मुखरूपी कमलने रोक रखा है। लाजरूपी रात्रिको देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्रोंका जल नेत्रोंके कोने (कोये) में ही रह जाता है। जैसे बड़े भारी कंजूसका सोना कोनेमें ही गड़ा रह जाता है ॥ १ ॥
सकुची व्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी ॥ तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा ॥