भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 269
  • बालकाण्ड *

२६७

श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनयके साथ कोमल और शीतल वाणी बोले— हे नाथ! सुनिये, आप तो स्वभावसे ही सुजन हैं। आप बालकके वचनपर कान न कीजिये (उसे सुना-अनसुना कर दीजिये) ॥ १ ॥

बरै बालकु एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥ तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा॥

बैँ और बालकका एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने (लक्ष्मणने) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ! आपका अपराधी तो मैं हूँ ॥ २ ॥

कृपा कोपु बधु बँधब गोसाई। मो पर करिअ दास की नाई॥ कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोड़ करौं उपाई॥

अतः हे स्वामी! कृपा, क्रोध, वध और बन्धन, जो कुछ करना हो, दासकी तरह (अर्थात् दास समझकर) मुझपर कीजिये। जिस प्रकारसे शीघ्र आपका क्रोध दूर हो, हे मुनिराज! बताइये, मैं वही उपाय करूँ ॥ ३ ॥

कह मुनि राम जाइ रिस कैसैं। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसैं॥ एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा॥

मुनिने कहा—हे राम! क्रोध कैसे जाय; अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है। इसकी गर्दनपर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या? ॥ ४ ॥

दो०—गर्भ स्ववहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।

परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर ॥ २७९ ॥

मेरे जिस कुठारकी घोर करनी सुनकर राजाओंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसेके रहते मैं इस शत्रु राजपुत्रको जीवित देख रहा हूँ ॥ २७९ ॥

बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥ भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥

हाथ चलता नहीं, क्रोधसे छाती जली जाती है। [हाय!] राजाओंका घातक यह कुठार भी कुण्ठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदयमें किसी समय भी कृपा कैसी? ॥ १ ॥

आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा॥ बाउ कृपा मूर्ति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥