श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२७१
देवता, दैत्य, राजा या और बहुत-से योद्धा, वे चाहे बलमें हमारे बराबर हों, चाहे अधिक बलवान् हों, यदि रणमें हमें कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों न हो? ॥ १ ॥
छत्रिय तनु धरि समर सकाना । कुल कलंकु तेहिं पावैर आना ॥ कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिं न रन रघुबंसी ॥
क्षत्रियका शरीर धरकर जो युद्धमें डर गया, उस नीचने अपने कुलपर कलङ्ग लगा दिया। मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, कुलकी प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रणमें कालसे भी नहीं डरते ॥ २ ॥
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई । अभय होइ जो तुम्हहि डेराई ॥ सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के । उधरे पटल परसुधर मति के ॥
ब्राह्मणवंशकी ऐसी ही प्रभुता (महिमा) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है]। श्रीरघुनाथजीके कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजीकी बुद्धिके परदे खुल गये ॥ ३ ॥
राम रमापति कर धनु लेहू । खैँचहु मिटै मोर संदेहू ॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ । परसुराम मन बिसमय भयऊ ॥
[परशुरामजीने कहा—] हे राम! हे लक्ष्मीपति ! धनुषको हाथमें [अथवा लक्ष्मीपति विष्णुका धनुष] लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा सन्देह मिट जाय। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चला गया। तब परशुरामजीके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४ ॥
दो०—जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेम अमात ॥ २८४ ॥
तब उन्होंने श्रीरामजीका प्रभाव जाना, [जिसके कारण] उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। वे हाथ जोड़कर वचन बोले—प्रेम उनके हृदयमें समाता न था— ॥ २८४ ॥
जय रघुबंस बनज बन भानू । गहन दनुज कुल दहन कृसानू ॥ जय सुर बिप्र धेनु हितकारी । जय मद मोह कोह भ्रम हारी ॥
हे रघुकुलरूपी कमलवनके सूर्य! हे राक्षसोंके कुलरूपी घने जंगलको जलानेवाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गौका हित करनेवाले! आपकी जय हो। हे मद, मोह, क्रोध और भ्रमके हरनेवाले! आपकी जय हो ॥ १ ॥
बिनय सील करुना गुन सागर । जयति बचन रचना अति नागर ॥ सेवक सुखद सुभग सब अंगा । जय सरीर छबि कोटि अनंगा ॥