श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२७७
[भैया!] जिस दिनसे मुनि उन्हें लिवा ले गये, तबसे आज ही हमने सच्ची खबर पायी है। कहो तो महाराज जनकने उन्हें कैसे पहचाना? ये प्रिय (प्रेमभरे) वचन सुनकर दूत मुसकराये ॥ ४ ॥
दो०— सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ ।
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ ॥ २९१ ॥
[दूतोंने कहा—] हे राजाओंके मुकुटमणि! सुनिये, आपके समान धन्य और कोई नहीं है, जिनके राम-लक्ष्मण-जैसे पुत्र हैं, जो दोनों विश्वके विभूषण हैं ॥ २९१ ॥
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे । पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे ॥ जिन्ह के जस प्रताप कें आगे । ससि मलीन रबि सीतल लागे ॥
आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं। वे पुरुषसिंह तीनों लोकोंके प्रकाशस्वरूप हैं। जिनके यशके आगे चन्द्रमा मलिन और प्रतापके आगे सूर्य शीतल लगता है, ॥ १ ॥
तिन्ह कहैं कहिअ नाथ किमि चीन्हे । देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे ॥ सीय स्वयंवर भूप अनेका । समिटे सुभट एक तें एका ॥
हे नाथ! उनके लिये आप कहते हैं कि उन्हें कैसे पहचाना! क्या सूर्यको हाथमें दीपक लेकर देखा जाता है? सीताजीके स्वयंवरमें अनेकों राजा और एक-से-एक बढ़कर योद्धा एकत्र हुए थे, ॥ २ ॥
संभु सरासनु काहुँ न टारा । हारे सकल बीर बरिआरा ॥ तीनि लोक महँ जे भटमानी । सभ कै सकति संभु धनु भानी ॥
परन्तु शिवजीके धनुषको कोई भी नहीं हटा सका। सारे बलवान् बीर हार गये। तीनों लोकोंमें जो वीरताके अभिमानी थे, शिवजीके धनुषने सबकी शक्ति तोड़ दी ॥ ३ ॥
सकड़ उठाइ सरासुर मेरू । सोउ हियँ हरि गयउ करि फेरू ॥ जेहिं कौतुक सिवसैलु उठावा । सोउ तेहि सभों पराभउ पावा ॥
बाणासुर, जो सुमेरूको भी उठा सकता था, वह भी हृदयमें हारकर परिक्रमा करके चला गया; और जिसने खेलसे ही कैलासको उठा लिया था, वह रावण भी उस सभामें पराजयको प्राप्त हुआ ॥ ४ ॥
दो०— तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल ।
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल ॥ २९२ ॥
हे महाराज! सुनिये, वहाँ (जहाँ ऐसे-ऐसे योद्धा हार मान गये) रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने बिना ही प्रयास शिवजीके धनुषको वैसे ही तोड़ डाला जैसे हाथी कमलकी डंडीको तोड़ डालता है ॥ २९२ ॥