श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
२८१
लोगोंने अपने-अपने घरोंको सजाकर मङ्गलमय बना लिया। गलियोंको चतुरसमसे सींचा और [द्वारोंपर] सुन्दर चौक पुराये। [चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूरसे बने हुए एक सुगन्धित द्रवको चतुरसम कहते हैं] ॥ २१६ ॥
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि । सजि नवसप्त सकल दुति दामिनि ॥ बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि । निज सरूप रति मानु बिमोचनि ॥
बिजलीकी-सी कान्तिवाली चन्द्रमुखी, हरिनके बच्चेके-से नेत्रवाली और अपने सुन्दर रूपसे कामदेवकी स्त्री रतिके अभिमानको छुड़ानेवाली सुहागिनी स्त्रियाँ सभी सोलहों शृंगार सजकर, जहाँ-तहाँ झुंड-की-झुंड मिलकर, ॥ १ ॥
गावहिं मंगल मंजुल बानीं । सुनि कलरव कलकंठि लजानीं ॥ भूप भवन किमि जाड़ बखाना । बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना ॥
मनोहर वाणीसे मङ्गलगीत गा रही हैं, जिनके सुन्दर स्वरको सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं। राजमहलका वर्णन कैसे किया जाय, जहाँ विश्वको विमोहित करनेवाला मण्डप बनाया गया है ॥ २ ॥
मंगल द्रव्य मनोहर नाना । राजत बाजत बिपुल निसाना ॥ कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं । कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं ॥
अनेकों प्रकारके मनोहर माङ्गलिक पदार्थ शोभित हो रहे हैं और बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। कहीं भाट विरुदावली (कुलकीर्ति) का उच्चारण कर रहे हैं और कहीं ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं ॥ ३ ॥
गावहिं सुंदरि मंगल गीता । लै लै नामु रामु अरु सीता ॥ बहुत उछाहु भवनु अति थोरा । मानहुँ उमगि चला चहु ओरा ॥
सुन्दरी स्त्रियाँ श्रीरामजी और श्रीसीताजीका नाम ले-लेकर मङ्गलगीत गा रही हैं। उत्साह बहुत है और महल अत्यन्त ही छोटा है। इससे [उसमें न समाकर] मानो वह उत्साह (आनन्द) चारों ओर उमड़ चला है ॥ ४ ॥
दो०—सोभा दसरथ भवन कड़ को कबि बरनै पार।
जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार ॥ २१७ ॥
दशरथके महलकी शोभाका वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहाँ समस्त देवताओंके शिरोमणि रामचन्द्रजीने अवतार लिया है ॥ २१७ ॥
भूप भरत पुनि लिए बोलाई । हय गय स्यंदन साजहु जाई ॥ चलहु बेगि रघुबीर बराता । सुनत पुलक पूरे दोउ भाता ॥