भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 285
  • बालकाण्ड *

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सारथियोंने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणोंको लगाकर रथोंको बहुत विलक्षण बना दिया है। उनमें सुन्दर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुन्दर शब्द कर रही हैं। वे रथ इतने सुन्दर हैं मानो सूर्यके रथकी शोभाको छीने लेते हैं ॥ २ ॥

सावँकरन अगनिन्त हय होते । ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते ॥ सुंदर सकल अलंकृत सोहे । जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे ॥

अगणिन्त श्यामकर्ण घोड़े थे। उनको सारथियोंने उन रथोंमें जोत दिया है, जो सभी देखनेमें सुन्दर और गहनोंसे सजाये हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियोंके मन भी मोहित हो जाते हैं ॥ ३ ॥

जे जल चलहिं थलहि की नाई । टाप न बूड़ बेग अधिकाई ॥ अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई । रथी सारथिन्ह लिए बोलाई ॥

जो जलपर भी जमीनकी तरह ही चलते हैं। वेगकी अधिकतासे उनकी टाप पानीमें नहीं डूबती। अस्त्र-शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियोंने रथियोंको बुला लिया ॥ ४ ॥

दो०— चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात । होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात ॥ २९९ ॥

रथोंपर चढ़-चढ़कर बारात नगरके बाहर जुटने लगी। जो जिस कामके लिये जाता है, सभीको सुन्दर शकुन होते हैं ॥ २९९ ॥

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं । कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं ॥ चले मत्त गज घंट बिराजी । मनहुँ सुभग सावन घन राजी ॥

श्रेष्ठ हाथियोंपर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, सो कहा नहीं जा सकता। मतवाले हाथी घंटोंसे सुशोभित होकर (घंटे बजाते हुए) चले, मानो सावनके सुन्दर बादलोंके समूह [गरजते हुए] जा रहे हों ॥ १ ॥

बाहन अपर अनेक बिधाना । सिबिका सुभग सुखासन जाना ॥ तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बूँदा । जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा ॥

सुन्दर पालकियाँ, सुखसे बैठने योग्य तामजान (जो कुर्सीनुमा होते हैं) और रथ आदि और भी अनेकों प्रकारकी सवारियाँ हैं। उनपर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समूह चढ़कर चले, मानो सब वेदोंके छन्द ही शरीर धारण किये हुए हों ॥ २ ॥

मागध सूत बंदि गुनगायक । चले जान चढ़ि जो जेहि लायक ॥ बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती । चले बस्तु भरि अगनिन्त भाँती ॥

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