भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • रामचरितमानस *

कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे॥ निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥

पवित्र, सुगन्धित और मङ्गल जलसे भरे सोनेके कलश और मणियोंकी सुन्दर परातें राजा और रानीने आनन्दित होकर अपने हाथोंसे लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रखीं॥ ३ ॥

पढ़िहँ बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥ बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत परखारन लागे॥

मुनि मङ्गलवाणीसे वेद पढ़ रहे हैं। सुअवसर जानकर आकाशसे फूलोंकी झड़ी लग गयी है। दूलहको देखकर राजा-रानी प्रेममग्ग हो गये और उनके पवित्र चरणोंको परखारने लगे॥ ४ ॥

छं०—लागे परखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली। नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥ जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं। जेसकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥

वे श्रीरामजीके चरणकमलोंको परखारने लगे, प्रेमसे उनके शरीरमें पुलकावली छा रही है। आकाश और नगरमें होनेवाली गान, नगाड़े और जय-जयकारकी ध्वनि मानो चारों दिशाओंमें उमड़ चली। जो चरणकमल कामदेवके शत्रु श्रीशिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है और कलियुगके सारे पाप भाग जाते हैं, ॥ १ ॥

जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई। मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥ करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं। ते पद परखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं॥

जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनिकी स्त्री अहल्याने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलोंका मकरन्दरस (गङ्गाजी) शिवजीके मस्तकपर विराजमान है, जिसको देवता पवित्रताकी सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मनको भौरा बनाकर जिन चरणकमलोंका सेवन करके मनोवाञ्छित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणोंको भाग्यके पात्र (बड़भागी) जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं॥ २ ॥

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं। भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनंद भरैं॥