भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

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  • रामचरितमानस *

राजा प्रणाम और पूजन करके, फिर हाथ जोड़कर मानो अमृतमें डुबोयी हुई वाणी बोले— हे मुनिराज! सुनिये, आपकी कृपासे आज मैं पूर्णकाम हो गया ॥ ३ ॥

अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं । देहु धेनु सब भाँति बनाईं ॥ सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई । पुनि पठए मुनिबृंद बोलाईं ॥

हे स्वामिन्! अब सब ब्राह्मणोंको बुलाकर उनको सब तरह [गहनों-कपड़ों] से सजी हुई गायें दीजिये। यह सुनकर गुरुजीने राजाकी बड़ाई करके फिर मुनिगणोंको बुलवा भेजा ॥ ४ ॥

दो०—बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।

आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि ॥ ३३० ॥

तब वामदेव, देवरि नारद, बाल्मीकि, जाबालि और विश्वामित्र आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियोंके समूह-के-समूह आये ॥ ३३० ॥

दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हें । पूजि सप्रेम बरासन दीन्हें ॥ चारि लच्छ बर धेनु मगाईं । काम सुरभि सम सील सुहाईं ॥

राजाने सबको दण्डवत् प्रणाम किया और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन दिये। चार लाख उत्तम गायें मँगवारीं, जो कामधेनुके समान अच्छे स्वभाववाली और सुहावनी थीं ॥ १ ॥

सब बिधि सकल अलंकृत कीन्ही । मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्ही ॥ करत बिनय बहु बिधि नरनाहू । लहेउँ आजु जगजीवन लाहू ॥

उन सबको सब प्रकारसे [गहनों-कपड़ोंसे] सजाकर राजाने प्रसन्न होकर भूदेव ब्राह्मणोंको दिया। राजा बहुत तरहसे विनती कर रहे हैं कि जगत्में मैंने आज ही जीनेका लाभ पाया ॥ २ ॥

पाइ असीस महीसु अनंदा । लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा ॥ कनक बसन मनि हय गय स्यंदन । दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन ॥

[ब्राह्मणोंसे] आशीर्वाद पाकर राजा आनन्दित हुए। फिर याचकोंके समूहोंको बुलवा लिया और सबको उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ (जिसने जो चाहा सो) सूर्यकुलको आनन्दित करनेवाले दशरथजीने दिये ॥ ३ ॥

चले पढ़त गावत गुन गाथा । जय जय जय दिनकर कुल नाथा ॥ एहि बिधि राम बिआह उछाहू । सकड़ न बरनि सहस मुख जाहू ॥

वे सब गुणानुवाद गाते और 'सूर्यकुलके स्वामीकी जय हो, जय हो, जय हो' कहते हुए चले। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीके विवाहका उत्सव हुआ। जिन्हें सहस्र मुख हैं वे शेषजी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते ॥ ४ ॥