श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
३११
सास, ससुर और गुरुकी सेवा करना। पतिका रुख देखकर उनकी आज्ञाका पालन करना। सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेहके वश कोमल वाणीसे स्त्रियोंके धर्म सिखलाती हैं ॥ ३ ॥
सादर सकल कुअरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई॥ बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं॥
आदरके साथ सब पुत्रियोंको [स्त्रियोंके धर्म] समझाकर रानियोंने बार-बार उन्हें हृदयसे लगाया। माताएँ फिर-फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्माने स्त्रीजातिको क्यों रचा ॥ ४ ॥
दो०—तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु॥ ३३४ ॥
उसी समय सूर्यवंशके पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी भाइयोंसहित प्रसन्न होकर विदा करानेके लिये जनकजीके महलको चले ॥ ३३४ ॥
चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए॥ कोउ कह चलन चहत हिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥
स्वभावसे ही सुन्दर चारों भाइयोंको देखनेके लिये नगरके स्त्री-पुरुष दौड़े। कोई कहता है—आज ये जाना चाहते हैं। विदेहने विदाईका सब सामान तैयार कर लिया है ॥ १ ॥
लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी॥ को जानै केहिं सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी॥
राजाके चारों पुत्र, इन प्यारे मेहमानोंके [मनोहर] रूपको नेत्र भरकर देख लो। हे सयानी! कौन जाने, किस पुण्यसे विधाताने इन्हें यहाँ लाकर हमारे नेत्रोंका अतिथि किया है ॥ २ ॥
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा॥ पाव नारकी हरिपदु जैसैं। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसैं॥
मरनेवाला जिस तरह अमृत पा जाय, जन्मका भूखा कल्पवृक्ष पा जाय और नरकमें रहनेवाला (या नरकके योग्य) जीव जैसे भगवान्के परमपदको प्राप्त हो जाय, हमारे लिये इनके दर्शन वैसे ही हैं ॥ ३ ॥
निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू॥ एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअरि सब राज निकेता॥
श्रीरामचन्द्रजीकी शोभाको निरखकर हृदयमें धर लो। अपने मनको साँप और इनकी मूर्तिको मणि बना लो। इस प्रकार सबको नेत्रोंका फल देते हुए सब राजकुमार राजमहलमें गये ॥ ४ ॥
दो०—रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु॥ ३३५ ॥