श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी ॥ करौँ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई ॥
तब जनकजी हाथ जोड़कर मानो स्नेहरूपी अमृतमें डुबोकर वचन बोले—मैं किस तरह बनाकर (किन शब्दोंमें) विनती करूँ। हे महाराज! आपने मुझे बड़ी बड़ाई दी है ॥ ४ ॥
दो०—कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।
मिलनिपरसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति ॥ ३४० ॥
अयोध्यानाथ दशरथजीने अपने स्वजन समधीका सब प्रकारसे सम्मान किया। उनके आपसके मिलनेमें अत्यन्त विनय थी और इतनी प्रीति थी जो हृदयमें समाती न थी ॥ ३४० ॥
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा ॥
सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता ॥
जनकजीने मुनिमण्डलीको सिर नवाया और सभीसे आशीर्वाद पाया। फिर आदरके साथ वे रूप, शील और गुणोंके निधान सब भाइयोंसे—अपने दामादोंसे मिले; ॥ १ ॥
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए ॥
राम करौँ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा ॥
और सुन्दर कमलके समान हाथोंको जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेमसे ही जन्मे हों। हे रामजी! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूँ! आप मुनियों और महादेवजीके मनरूपी मानसरोवरके हंस हैं ॥ २ ॥
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी ॥
व्यापकु ब्रह्म अलखु अविनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी ॥
योगी लोग जिनके लिये क्रोध, मोह, ममता और मदको त्यागकर योगसाधन करते हैं, जो सर्वव्यापक, ब्रह्म, अव्यक्त, अविनाशी, चिदानन्द, निर्गुण और गुणोंकी राशि हैं, ॥ ३ ॥
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ॥
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई ॥
जिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमाको वेद 'नेति' कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द] तीनों कालोंमें एकरस (सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं; ॥ ४ ॥
दो०—नयन विषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल ॥ ३४१ ॥