भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 330

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  • रामचरितमानस *

राजमहलमें [आनन्दके मारे] शोर मच रहा है। उस समयका और सुखका वर्णन नहीं किया जा सकता। कौसल्याजी आदि श्रीरामचन्द्रजीकी सब माताएँ प्रेमके विशेष वश होनेसे शरीरकी सुध भूल गयीं ॥ ४ ॥

दो०—दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारि।

प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि ॥ ३४५ ॥

गणेशजी और त्रिपुरारि शिवजीका पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान दिया। वे ऐसी परम प्रसन्न हुईं, मानो अत्यन्त दरिद्री चारों पदार्थ पा गया हो ॥ ३४५ ॥

मोद प्रमोद बिबस सब माता । चलहिं न चरन सिथिल भए गाता ॥

राम दरस हित अति अनुरागीं । परिछनि साजु सजन सब लागीं ॥

सुख और महान् आनन्दसे विवश होनेके कारण सब माताओंके शरीर शिथिल हो गये हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनोंके लिये वे अत्यन्त अनुरागमें भरकर परछनका सब सामान सजाने लगीं ॥ १ ॥

बिबिध बिधान बाजने बाजे । मंगल मुदित सुमित्राँ साजे ॥

हरद दूब दधि पल्लव फूला । पान पूगफल मंगल मूला ॥

अनेकों प्रकारके बाजे बजते थे। सुमित्राजीने आनन्दपूर्वक मङ्गल साज सजाये। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी आदि मङ्गलकी मूल वस्तुएँ, ॥ २ ॥

अच्छत अंकुर लोचन लाजा । मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा ॥

छुहे पुरट घट सहज सुहाए । मदन सकुन जनु नीड़ बनाए ॥

तथा अक्षत (चावल), अँखुए, गोरोचन, लावा और तुलसीकी सुन्दर मंजरियाँ सुशोभित हैं। नाना रंगोंसे चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्णके कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेवके पक्षियोंने घोंसले बनाये हों ॥ ३ ॥

सगुन सुगंध न जाहिं बखानी । मंगल सकल सजहिं सब रानी ॥

रचीं आरतीं बहुत बिधाना । मुदित करहिं कल मंगल गाना ॥

शकुनकी सुगन्धित वस्तुएँ बखानी नहीं जा सकतीं। सब रानियाँ सम्पूर्ण मङ्गल साज सज रही हैं। बहुत प्रकारकी आरती बनाकर वे आनन्दित हुईं सुन्दर मङ्गलगान कर रही हैं ॥ ४ ॥

दो०—कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात ।

चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात ॥ ३४६ ॥

सोनेके थालोंको माङ्गलिक वस्तुओंसे भरकर अपने कमलके समान (कोमल) हाथोंमें लिये हुए माताएँ आनन्दित होकर परछन करने चलीं। उनके शरीर पुलकावलीसे छा गये हैं ॥ ३४६ ॥

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