श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
बिपुल बाजने बाजन लागे । नभ सुर नगर लोग अनुरागे ॥ बने बराती बरनि न जाहीं । महा मुदित मन सुख न समाहीं ॥
बहुत-से बाजे बजने लगे । आकाशमें देवता और नगरमें लोग सब प्रेममें मग्न हैं । बराती ऐसे बने-ठने हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता। परम आनन्दित हैं, सुख उनके मनमें समाता नहीं है ॥ २ ॥
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे । देखत रामहि भए सुखारे ॥ करहिं निछावरि मनिनगन चीरा । बारि बिलोचन पुलक सरीरा ॥
तब अयोध्यावासियोंने राजाको जोहार (वन्दना) की। श्रीरामचन्द्रजीको देखते ही वे सुखी हो गये। सब मणियों और वस्त्र निछावर कर रहे हैं। नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भरा है और शरीर पुलकित हैं ॥ ३ ॥
आरति करहिं मुदित पुर नारी । हरषहिं निरखि कुअँर बर चारी ॥ सिबिका सुभग ओहार उधारी । देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी ॥
नगरकी स्त्रियाँ आनन्दित होकर आरती कर रही हैं और सुन्दर चारों कुमारोंको देखकर हर्षित हो रही हैं। पालकियोंके सुन्दर परदे हटा-हटाकर वे दुलहिनोंको देखकर सुखी होती हैं ॥ ४ ॥
दो०—एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर। मुदित मातु परिछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार ॥ ३४८ ॥
इस प्रकार सबको सुख देते हुए राजद्वारपर आये। माताएँ आनन्दित होकर बहुओंसहित कुमारोंका परछन कर रही हैं ॥ ३४८ ॥
करहिं आरती बारहिं बारा । प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा ॥ भूषन मनि पट नाना जाती । करहिं निछावरि अगनिन्त भाँती ॥
वे बार-बार आरती कर रही हैं। उस प्रेम और महान् आनन्दको कौन कह सकता है! अनेकों प्रकारके आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगणित प्रकारकी अन्य वस्तुएँ निछावर कर रही हैं ॥ १ ॥
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी । परमानन्द मगन महतारी ॥ पुनि पुनि सीय राम छबि देखी । मुदित सफल जग जीवन लेखी ॥
बहुओंसहित चारों पुत्रोंको देखकर माताएँ परमानन्दमें मग्न हो गयीं। सीताजी और श्रीरामजीकी छबिको बार-बार देखकर वे जगत्में अपने जीवनको सफल मानकर आनन्दित हो रही हैं ॥ २ ॥