भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 343
  • बालकाण्ड *

३४१

कबिकुल जीवनु पावन जानी । राम सीय जसु मंगल खानी ॥ तेहि ते मैं कछु कहा बखानी । करन पुनीत हेतु निज बानी ॥

श्रीसीतारामजीके यशको कविकुलके जीवनको पवित्र करनेवाला और मङ्गलोंकी खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये कुछ (थोड़ा-सा) बखानकर कहा है ॥ ४ ॥

छं०—निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो । रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनैं लह्यो ॥ उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं । बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्वदा सुखु पावहीं ॥

अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये तुलसीने रामका यश कहा है। [नहीं तो] श्रीरघुनाथजीका चरित्र अपार समुद्र है, किस कविने उसका पार पाया है ? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाहके मङ्गलमय उत्सवका वर्णन आदरके साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजीकी कृपासे सदा सुख पावेंगे।

सो०—सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं । तिन्ह कहहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु ॥ ३६१ ॥

श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीके विवाह-प्रसङ्गको जो लोग प्रेमपूर्वक गायें-सुनेंगे, उनके लिये सदा उत्साह (आनन्द)-ही-उत्साह है; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीका यश मङ्गलका धाम है ॥ ३६१ ॥

मासपारायण, बारहवाँ विश्राम

इति श्रीमद्भामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथमः सोपानः समाप्तः ।

कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पहला सोपान समाप्त हुआ ॥

( बालकाण्ड समाप्त )

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