श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 343, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- बालकाण्ड *
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कबिकुल जीवनु पावन जानी । राम सीय जसु मंगल खानी ॥ तेहि ते मैं कछु कहा बखानी । करन पुनीत हेतु निज बानी ॥
श्रीसीतारामजीके यशको कविकुलके जीवनको पवित्र करनेवाला और मङ्गलोंकी खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये कुछ (थोड़ा-सा) बखानकर कहा है ॥ ४ ॥
छं०—निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो । रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनैं लह्यो ॥ उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं । बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्वदा सुखु पावहीं ॥
अपनी वाणीको पवित्र करनेके लिये तुलसीने रामका यश कहा है। [नहीं तो] श्रीरघुनाथजीका चरित्र अपार समुद्र है, किस कविने उसका पार पाया है ? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाहके मङ्गलमय उत्सवका वर्णन आदरके साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजीकी कृपासे सदा सुख पावेंगे।
सो०—सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं । तिन्ह कहहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु ॥ ३६१ ॥
श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीके विवाह-प्रसङ्गको जो लोग प्रेमपूर्वक गायें-सुनेंगे, उनके लिये सदा उत्साह (आनन्द)-ही-उत्साह है; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीका यश मङ्गलका धाम है ॥ ३६१ ॥
मासपारायण, बारहवाँ विश्राम
इति श्रीमद्भामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथमः सोपानः समाप्तः ।
कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पहला सोपान समाप्त हुआ ॥
( बालकाण्ड समाप्त )
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