श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए॥ किए धरम उपदेस घनैरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे॥
प्रेमयुक्त कोमल और सुन्दर वचन कहकर श्रीरामजीने बहुत प्रकारसे लोगोंको समझाया और बहुतेरे धर्मसम्बन्धी उपदेश दिये; परन्तु प्रेमवश लोग लौटाये लौटते नहीं ॥ २ ॥
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई॥ लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई॥
शील और स्नेह छोड़ा नहीं जाता। श्रीरघुनाथजी असमञ्जसके अधीन हो गये (दुविधामें पड़ गये)। शोक और परिश्रम (थकावट) के मारे लोग सो गये और कुछ देवताओंकी मायासे भी उनकी बुद्धि मोहित हो गयी ॥ ३ ॥
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती॥ खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता॥
जब दो पहर रात बीत गयी, तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमपूर्वक मन्त्री सुमन्त्रसे कहा—हे तात! रथके खोज मारकर (अर्थात् पहियोंके चिह्नोंसे दिशाका पता न चले इस प्रकार) रथको हाँकिये। और किसी उपायसे बात नहीं बनेगी ॥ ४ ॥
दो०—राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरण सिरु नाइ।
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ॥ ८५ ॥
शंकरजीके चरणोंमें सिर नवाकर श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी रथपर सवार हुए। मन्त्रीने तुरंत ही रथको, इधर-उधर खोज छिपाकर चला दिया ॥ ८५ ॥
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू॥ रथ कर खोज कतहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहुँ दिसि धावहिं॥
सबेरा होते ही सब लोग जागे, तो बड़ा शोर मचा कि श्रीरघुनाथजी चले गये। कहीं रथका खोज नहीं पाते, सब 'हा राम! हा राम!' पुकारते हुए चारों ओर दौड़ रहे हैं ॥ १ ॥
मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू॥ एकहि एक देहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू॥
मानो समुद्रमें जहाज डूब गया हो, जिससे व्यापारियोंका समुदाय बहुत ही व्याकुल हो उठा हो। वे एक-दूसरेको उपदेश देते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीने, हमलोगोंको क्लेश होगा, यह जानकर छोड़ दिया है ॥ २ ॥
निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना॥ जौँ पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा॥