श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अयोध्याकाण्ड *
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देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥ राम दीरख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ॥
सुन्दर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी वाल्मीकिजीके आश्रममें आये। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि मुनिका निवासस्थान बहुत सुन्दर है, जहाँ सुन्दर पर्वत, वन और पवित्र जल है ॥ ३ ॥
सरनि सरोज बिटप बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥ खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥
सरोवरोंमें कमल और वनोंमें वृक्ष फूल रहे हैं और मकरन्द-रसमें मस्त हुए भौर सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। बहुत-से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैरसे रहित होकर प्रसन्न मनसे विचर रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०— सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन । मुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन ॥ १२४ ॥
पवित्र और सुन्दर आश्रमको देखकर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी हर्षित हुए। रघुश्रेष्ठ श्रीरामजीका आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकिजी उन्हें लेनेके लिये आगे आये ॥ १२४ ॥
मुनि कहूँ राम दंडवत कीन्हा । आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ॥ देखि राम छवि नयन जुड़ाने । करि सनमानु आश्रमहिं आने ॥
श्रीरामचन्द्रजीने मुनिको दण्डवत् किया। विप्रश्रेष्ठ मुनिने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजीकी छवि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। सम्मानपूर्वक मुनि उन्हें आश्रममें ले आये ॥ १ ॥
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए । कंद मूल फल मधुर मगाए ॥ सिय सौमित्रि राम फल खाए । तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ॥
श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकिजीने प्राणप्रिय अतिथियोंको पाकर उनके लिये मधुर कन्द, मूल और फल मँगावाये। श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और रामचन्द्रजीने फलोंको खाया। तब मुनिने उनको [विश्राम करनेके लिये] सुन्दर स्थान बतला दिये ॥ २ ॥
बालमीकि मन आनँदु भारी । मंगल मूर्ति नयन निहारी ॥ तब कर कमल जोरि रघुराई । बोले बचन श्रवन सुखदाई ॥
[मुनि श्रीरामजीके पास बैठे हैं और उनकी] मङ्गल-मूर्तिको नेत्रोंसे देखकर वाल्मीकिजीके मनमें बड़ा भारी आनन्द हो रहा है। तब श्रीरघुनाथजी कमलसदृश हाथोंको जोड़कर, कानोंको सुख देनेवाले मधुर वचन बोले— ॥ ३ ॥