श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणोंने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषिकी पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबलसे लायी थीं। वह गङ्गाजीकी धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकोंको खा डालनेके लिये डाकिनी (डाइन) रूप है ॥ ३ ॥
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं । करहिं जोग जप तप तन कसहीं ॥ चलहु सफल श्रम सब कर करहू । राम देहु गौरव गिरिबरहू ॥
अत्रि आदि बहुत-से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीरको कसते हैं। हे रामजी! चलिये, सबके परिश्रमको सफल कीजिये और पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटको भी गौरव दीजिये ॥ ४ ॥
दो०—चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ।
आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ ॥ १३२ ॥
महामुनि वाल्मीकिजीने चित्रकूटकी अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजीसहित दोनों भाइयोंने आकर श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीमें स्नान किया ॥ १३२ ॥
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू । करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू ॥ लखन दीख पय उत्तर करारा । चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—लक्ष्मण! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहाँ कहीं ठहरनेकी व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजीने पयस्विनी नदीके उत्तरके ऊँचे किनारेको देखा [और कहा कि—] इसके चारों ओर धनुषके-जैसा एक नाला फिरा हुआ है ॥ १ ॥
नदी पनच सर सम दम दाना । सकल कलुष कलि साउज नाना ॥ चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकड़ न घात मार मुठभेरी ॥
नदी (मन्दाकिनी) उस धनुषकी प्रत्यञ्जा (डोरी) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुगके समस्त पाप उसके अनेकों हिसक पशु [रूप निशाने] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामनेसे मारता है ॥ २ ॥
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा । थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा ॥ रमेउ राम मनु देवन्ह जाना । चले सहित सुर थपति प्रधाना ॥
ऐसा कहकर लक्ष्मणजीने स्थान दिखलाया। स्थानको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। जब देवताओंने जाना कि श्रीरामचन्द्रजीका मन यहाँ रम गया तब वे देवताओंके प्रधान थवई (मकान बनानेवाले) विश्वकर्माको साथ लेकर चले ॥ ३ ॥