श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई । सचिव सहित रथ देखेसि आई ॥ मंत्री बिकल बिलोकि निषादु । कहि न जाइ जस भयउ बिषादू ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको पहुँचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने रथको मन्त्री (सुमन्त्र)-सहित देखा। मन्त्रीको व्याकुल देखकर निषादको जैसा दुःख हुआ, वह कहा नहीं जाता ॥ ३ ॥
राम राम सिय लखन पुकारी । परेउ धरनितल व्याकुल भारी ॥ देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥
[निषादको अकेले आया देखकर] सुमन्त्र हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! पुकारते हुए, बहुत व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़े। [रथके] घोड़े दक्षिण दिशाकी ओर [जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे] देख-देखकर हिनहिनाते हैं। मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हों ॥ ४ ॥
दो० — नहिं तून चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि ।
व्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि ॥ १४२ ॥
वे न तो घास चरते हैं, न पानी पीते हैं। केवल आँखोंसे जल बहा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीके घोड़ोंको इस दशामें देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये ॥ १४२ ॥
धरि धीरजु तब कहइ निषादू । अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू ॥ तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता । धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता ॥
तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा—हे सुमन्त्रजी! अब विषादको छोड़िये। आप पण्डित और परमार्थके जाननेवाले हैं। विधाताको प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये ॥ १ ॥
बिबिधि कथा कहि कहि मृदु बानी । रथ बैठारेउ बरबस आनी ॥ सोक सिथिल रथु सकड़ न हाँकी । रघुबर बिरह पीर उर बाँकी ॥
कोमल वाणीसे भाँति-भाँतिकी कथाएँ कहकर निषादने जबर्दस्ती लाकर सुमन्त्रको रथपर बैठाया। परन्तु शोकके मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथको हाँक नहीं सकते। उनके हृदयमें श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी बड़ी तीव्र वेदना है ॥ २ ॥
चरफराहिं मग चलहिं न घोरे । बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे ॥ अदृकि परिहिं फिरि हेरहिं पीछें । राम बियोगि बिकल दुख तीछें ॥
घोड़े तड़फड़ाते हैं और [ठीक] रास्तेपर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथमें जोत दिये गये हों। वे श्रीरामचन्द्रजीके वियोगी घोड़े कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर पीछेकी ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दुःखसे व्याकुल हैं ॥ ३ ॥