श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 490, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
नृपहि बचन प्रिय नहीं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥ करहु सीस धरि भूप रजाई । हड़ तुम्ह कहैं सब भाँति भलाई ॥
राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको प्रमाण (सत्य) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है ॥ ३ ॥
परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब सारखी ॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥
परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं। राजा यथातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी। पिताकी आज्ञा पालन करनेसे उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ ॥ ४ ॥
दो०—अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥ १७४ ॥
जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी (स्वर्ग)–में निवास करते हैं ॥ १७४ ॥
अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥ सुरपुर नृपु पाइहि परितोषु । तुम्ह कहूँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषु ॥
राजाका वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजाका पालन करो। ऐसा करनेसे स्वर्गमें राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लेगेगा ॥ १ ॥
बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥ करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर बचन हित जानी ॥
यह वेदमें प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रोंके द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानिका त्याग कर दो। मेरे वचनको हित समझकर मानो ॥ २ ॥
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥ कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥
इस बातको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजाके सुखसे सुखी होंगी ॥ ३ ॥
परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥ सौँपेहु राजु राम के आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥