भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 510

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  • रामचरितमानस *

सखा निषादराजके हाथसे हाथ मिलाये हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखासे पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ—और नेत्र और मनकी जलन कुछ ठंडी करो—॥ ३ ॥

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए । कहत भरे जल लोचन कोए ॥ भरत बचन सुनि भयउ बिषादू । तुरत तहाँ लड़ गयउ निषादू ॥

जहाँ सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रातको सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रोंके कोरोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। भरतजीके वचन सुनकर निषादको बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहाँ ले गया—॥ ४ ॥

दो०—जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु । अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु ॥ १९८ ॥

जहाँ पवित्र अशोकके वृक्षके नीचे श्रीरामजीने विश्राम किया था। भरतजीने वहाँ अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया ॥ १९८ ॥

कुस साँथरी निहारि सुहाई । कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई ॥ चरन रेख रज आँखिन्ह लाई । बनड़ न कहत प्रीति अधिकाई ॥

कुशोंकी सुन्दर साथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजीके चरण-चिह्नोंकी रज आँखोंमें लगायी। [उस समयके] प्रेमकी अधिकता कहते नहीं बनती ॥ १ ॥

कनक बिंदु दुड़ु चारिक देखे । राखे सीस सीय सम लेखे ॥ सजल बिलोचन हृदयँ गलानी । कहत सखा सन बचन सुबानी ॥

भरतजीने दो-चार स्वर्णविन्दु (सोनेके कण या तारे आदि जो सीताजीके गहने-कपड़ोंसे गिर पड़े थे) देखे तो उनको सीताजीके समान समझकर सिरपर रख लिया। उनके नेत्र [प्रेमाश्रुके] जलसे भरे हैं और हृदयमें ग्लानि भरी है। वे सखासे सुन्दर वाणीमें ये वचन बोले—॥ २ ॥

श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना । जथा अवध नर नारि बिलीना ॥ पिता जनक देउँ पटतर केही । करतल भोगु जोगु जग जेही ॥

ये स्वर्णके कण या तारे भी सीताजीके विरहसे ऐसे श्रीहत (शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं, जैसे [रामवियोगमें] अयोध्याके नर-नारी विलीन (शोकके कारण क्षीण) हो रहे हैं। जिन सीताजीके पिता राजा जनक हैं, इस जगत्में भोग और योग दोनों ही जिनकी मुट्ठीमें हैं, उन जनकजीको मैं किसकी उपमा दूँ? ॥ ३ ॥

ससुर भानुकुल भानु भुआलू । जेहि सिहात अमरावतिपालू ॥ प्राननाथु रघुनाथ गोसाई । जो बड़ होत सो राम बड़ाई ॥

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