श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
और फिर कुटुम्बसहित भरतजीको दिये, क्योंकि ऋषि भरद्वाजजीने ऐसी ही आज्ञा दे रखी थी। [भरतजी चाहते थे कि उनके सब संगियोंको आराम मिले, इसलिये उनके मनकी बात जानकर मुनिने पहले उन लोगोंको स्थान देकर पीछे सपरिवार भरतजीको स्थान देनेके लिये आज्ञा दी थी।] मुनिश्रेष्ठने तपोबलसे ब्रह्माको भी चकित कर देनेवाला वैभव रच दिया ॥ २१४ ॥
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका । सब लघु लगे लोकपति लोका ॥ सुख समाजु नहीं जाइ बखानी । देखत बिरति बिसारहिं ग्यानी ॥
जब भरतजीने मुनिके प्रभावको देखा तो उसके सामने उन्हें [इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर आदि] सभी लोकपालोंके लोक तुच्छ जान पड़े। सुखकी सामग्रीका वर्णन नहीं हो सकता, जिसे देखकर ज्ञानीलोग भी वैराग्य भूल जाते हैं ॥ १ ॥
आसन सयन सुबसन बिताना । बन बाटिका बिहग मृग नाना ॥ सुरभि फूल फल अमिअ समाना । बिमल जलासय बिबिध बिधाना ॥
आसन, सेज, सुन्दर वस्त्र, चंदोवे, वन, बगीचे, भाँति-भाँतिके पक्षी और पशु, सुगन्धित फूल और अमृतके समान स्वादिष्ट फल, अनेकों प्रकारके (तालाब, कुएँ, बावली आदि) निर्मल जलाशय, ॥ २ ॥
असन पान सुचि अमिअ अमी से । देखि लोग सकुचात जमी से ॥ सुर सुरभी सुरतरु सबही कें । लिखि अभिलाषु सुरेस सची कें ॥
तथा अमृतके भी अमृत-सरीखे पवित्र खान-पानके पदार्थ थे, जिन्हें देखकर सब लोग संयमी पुरुषों (विरक्त मुनियों) की भाँति सकुचा रहे हैं। सभीके डेरोंमें [मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले] कामधेनु और कल्पवृक्ष हैं, जिन्हें देखकर इन्द्र और इन्द्राणीको भी अभिलाषा होती है (उनका भी मन ललचा जाता है) ॥ ३ ॥
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी । सब कहैं सुलभ पदारथ चारी ॥ स्वरक चंदन बनितादिक भोगा । देखि हरष बिसमय बस लोगा ॥
वसन्त-ऋतु है। शीतल, मन्द, सुगन्ध तीन प्रकारकी हवा बह रही है। सभीको [धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष] चारों पदार्थ सुलभ हैं। माला, चन्दन, स्त्री आदिक भोगोंको देखकर सब लोग हर्ष और विषादके वश हो रहे हैं। [हर्ष तो भोग-सामग्रियोंको और मुनिके तपःप्रभावको देखकर होता है और विषाद इस बातसे होता है कि श्रीरामके वियोगमें नियम-व्रतसे रहनेवाले हमलोग भोग-विलासमें क्यों आ फँसे; कहीं इनमें आसक्त होकर हमारा मन नियम-व्रतोंको न त्याग दे] ॥ ४ ॥
दो०—संपति चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार । तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥ २१५ ॥