श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 526, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जड़ चेतन मग जीव घनरे । जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ॥ ते सब भए परम पद जोगू । भरत दरस मेटा भव रोगू ॥
रास्तेमें असंख्य जड़-चेतन जीव थे । उनमेंसे जिनको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको देखा वे सब [उसी समय] परमपदके अधिकारी हो गये । परन्तु अब भरतजीके दर्शनने तो उनका भव (जन्म-मरण)-रूपी रोग मिया ही दिया । [श्रीरामदर्शनसे तो वे परमपदके अधिकारी ही हुए थे, परन्तु भरतदर्शनसे उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया] ॥ १ ॥
यह बड़ि बात भरत कड़ नाहीं । सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ॥ बारक राम कहत जग जेऊ । होत तरन तारन नर तेऊ ॥
भरतजीके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें श्रीरामजी स्वयं अपने मनमें स्मरण करते रहते हैं । जगत्में जो भी मनुष्य एक बार 'राम' कह लेते हैं, वे भी तरने-तारनेवाले हो जाते हैं ! ॥ २ ॥
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता । कस न होइ मगु मंगलदाता ॥ सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं । भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ॥
फिर भरतजी तो श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे । तब भला उनके लिये मार्ग मङ्गल (सुख) दायक कैसे न हो? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजीको देखकर हृदयमें हर्ष-लाभ करते हैं ॥ ३ ॥
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू । जगु भल भलेहि पोच कहूँ पोचू ॥ गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई । रामहि भरतहि भेट न होई ॥
भरतजीके [इस प्रेमके] प्रभावको देखकर देवराज इन्द्रको सोच हो गया [कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय] । संसार भलेके लिये भला और बुरेके लिये बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दीखता है) । उसने गुरु बृहस्पतिजीसे कहा—हे प्रभो! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीकी भेंट ही न हो ॥ ४ ॥
दो०—रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ॥ २१७ ॥
श्रीरामचन्द्रजी संकोची और प्रेमके वश हैं और भरतजी प्रेमके समुद्र हैं । बनी-बनायी बात बिगड़ना चाहती है, इसलिये कुछ छल ढूँढ़कर इसका उपाय कीजिये ॥ २१७ ॥
बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहसनयन बिनु लोचन जाने ॥
मायापति सेवक सन माया । करड़ त उलटि परड़ सुरराया ॥