श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें५२६
- रामचरितमानस *
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसार ॥ अगुन अलेप अमान एकरस । रामु सगुन भए भगत पेम बस ॥
तथापि वे भक्त और अभक्तके हृदयके अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं (भक्तको प्रेमसे गले लगा लेते हैं और अभक्तको मारकर तार देते हैं)। गुणरहित, निलैप, मानरहित और सदा एकरस भगवान् श्रीराम भक्तके प्रेमवश ही सगुण हुए हैं ॥ ३ ॥
राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर सारखी ॥ अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई । करहु भरत पद प्रीति सुहाई ॥
श्रीरामजी सदा अपने सेवकों (भक्तों) की रुचि रखते आये हैं। वेद, पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं। ऐसा हृदयमें जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजीके चरणोंमें सुन्दर प्रीति करो ॥ ४ ॥
दो०—राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ॥ २१९ ॥
हे देवराज इन्द्र ! श्रीरामचन्द्रजीके भक्त सदा दूसरोंके हितमें लगे रहते हैं, वे दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दयालु होते हैं। फिर, भरतजी तो भक्तोंके शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो ॥ २१९ ॥
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी । भरत राम आयस अनुसारी ॥ स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू । भरत दोसु नहिं राउर मोहू ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओंका हित करनेवाले हैं। और भरतजी श्रीरामजीकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थके विशेष वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजीका कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है ॥ १ ॥
सुनि सुरबर सुगुर बर बानी । भा प्रमोदु मन मिटी गलानी ॥ बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ । लगे सराहन भरत सुभाऊ ॥
देवगुर बृहस्पतिजीकी श्रेष्ठ वाणी सुनकर इन्द्रके मनमें बड़ा आनन्द हुआ और उनकी चिन्ता मिट गयी। तब हर्षित होकर देवराज फूल बरसाकर भरतजीके स्वभावकी सराहना करने लगे ॥ २ ॥
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं । दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं ॥ जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा । उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा ॥
इस प्रकार भरतजी मार्गमें चले जा रहे हैं। उनकी [प्रेममयी] दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते हैं। भरतजी जभी 'राम' कहकर लंबी साँस लेते हैं, तभी मानो चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है ॥ ३ ॥
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना । पुरजन पेमु न जाइ बखाना ॥ बीच बास करि जमुनहिं आए । निरखि नीरु लोचन जल छाए ॥