भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 551
  • अयोध्याकाण्ड *

५४९

जनकसुता तब उर धरि धीरा । नील नलिन लोयन भरि नीरा ॥ मिली सकल सासुन्ह सिय जाई । तेहि अवसर करुना महि छाई ॥

तब जानकीजी हृदयमें धीरज धरकर, नील कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर, सब सासुओंसे जाकर मिलीं। उस समय पृथ्वीपर करुणा (करुण-रस) छा गयी ॥ ४ ॥

दो०— लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग ।

हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग ॥ २४६ ॥

सीताजी सबके पैरों लग-लगकर अत्यन्त प्रेमसे मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्नेहवश हृदयसे आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहागसे भरी रहो (अर्थात् सदा सौभाग्यवती रहो) ॥ २४६ ॥

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं । बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ॥ कहि जग गति मायिक मुनिनाथा । कहे कछुक परमारथ गाथा ॥

सीताजी और सब रानियाँ स्नेहेके मारे व्याकुल हैं। तब ज्ञानी गुरुने सबको बैठ जानेके लिये कहा। फिर मुनिनाथ वसिष्ठजीने जगत्की गतिको मायिक कहकर (अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थकी कथाएँ (बातेँ) कहीं ॥ १ ॥

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा । सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा ॥ मरन हेतु निज नेहु बिचारी । भे अति बिकल धीर धुर धारी ॥

तदनन्तर वसिष्ठजीने राजा दशरथजीके स्वर्गगमनकी बात सुनायी, जिसे सुनकर रघुनाथजीने दुःसह दुःख पाया। और अपने प्रति उनके स्नेहको उनके मरनेका कारण विचारकर धीरधुरन्धर श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त व्याकुल हो गये ॥ २ ॥

कुलिस कठोर सुनत कटु बानी । बिलपत लखन सीय सब रानी ॥ सोक बिकल अति सकल समाजू । मानहुँ राजु अकाजेउ आजू ॥

वज्रके समान कठोर, कड़वी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियाँ विलाप करने लगीं। सारा समाज शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो गया! मानो राजा आज ही मरे हों ॥ ३ ॥

मुनिबर बहुरि राम समुझाए । सहित समाज सुसरित नहाए ॥ ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा । मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा ॥

फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने श्रीरामजीको समझाया। तब उन्होंने समाजसहित श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनीजीमें स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने निर्जल व्रत किया। मुनि वसिष्ठजीके कहनेपर भी किसीने जल ग्रहण नहीं किया ॥ ४ ॥