श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें५४ * रामचरितमानस *
यमदूतोंके मुखपर कालिख लगानेके लिये यह जगत्में यमुनाजीके समान है और जीवोंको मुक्ति देनेके लिये मानो काशी ही है। यह श्रीरामजीको पवित्र तुलसीके समान प्रिय है और तुलसीदासके लिये हुलसी (तुलसीदासजीकी माता) के समान हृदयसे हित करनेवाली है॥६॥
सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥ सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥
यह रामकथा शिवजीको नर्मदाजीके समान प्यारी है, यह सब सिद्धियोंकी तथा सुख-सम्पत्तिकी राशि है। सद्गुणरूपी देवताओंके उत्पन्न और पालन-पोषण करनेके लिये माता अदितिके समान है। श्रीरघुनाथजीकी भक्ति और प्रेमकी परम सीमा-सी है॥७॥
दो०—रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु। तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु॥३१॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि रामकथा मन्दाकिनी नदी है, सुन्दर (निर्मल) चित्त चित्रकूट है, और सुन्दर स्नेह ही वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं॥३१॥
रामचरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥ जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र सुन्दर चिन्तामणि है और संतोंकी सुबुद्धिरूपी स्त्रीका सुन्दर श्रृङ्गार है। श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूह जगत्का कल्याण करनेवाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधामके देनेवाले हैं॥१॥
सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के॥ जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥
ज्ञान, वैराग्य और योगके लिये सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोगका नाश करनेके लिये देवताओंके वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये श्रीसीतारामजीके प्रेमके उत्पन्न करनेके लिये माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमोंके बीज हैं॥२॥
समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के॥ सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के॥
पाप, सन्ताप और शोकका नाश करनेवाले तथा इस लोक और परलोकके प्रिय पालन करनेवाले हैं। विचार (ज्ञान) रूपी राजाके शूरवीर मन्त्री और लोभरूपी अपार समुद्रके सोखनेके लिये अगस्त्य मुनि हैं॥३॥
काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के॥ अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के॥