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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 582

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  • रामचरितमानस *

कौसल्याजीने दुःखभरे हृदयसे कहा—श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनमें जायँ, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरतकी चिन्ता है ॥ २८२ ॥

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी । सुत सुतबधू देवसरि बारी ॥ राम सपथ मैं कीन्हि न काऊ । सो करि कहउँ सखी सति भाऊ ॥

ईश्वरके अनुग्रह और आपके आशीर्वादसे मेरे [चारों] पुत्र और [चारों] बहुएँ गङ्गाजीके जलके समान पवित्र हैं। हे सखी! मैंने कभी श्रीरामकी सौगन्ध नहीं की, सो आज श्रीरामकी शपथ करके सत्य भावसे कहती हूँ— ॥ १ ॥

भरत सील गुन बिनय बड़ाई । भायप भगति भरोस भलाई ॥ कहत सारदहु कर मति हीचे । सागर सीप कि जाहिं उलीचे ॥

भरतके शील, गुण, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपनका वर्णन करनेमें सरस्वतीजीकी बुद्धि भी हिचकती है। सीपसे कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं? ॥ २ ॥

जानउँ सदा भरत कुलदीपा । बार बार मोहि कहेउ महीपा ॥ कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ । पुरुष परिखिअहिं समर्यँ सुभाएँ ॥

मैं भरतको सदा कुलका दीपक जानती हूँ। महाराजने भी बार-बार मुझे यही कहा था। सोना कसौटीपर कैसे जानेपर और रत्न पारखी (जौहरी) के मिलनेपर ही पहचाना जाता है। वैसे ही पुरुषकी परीक्षा समय पड़नेपर उसके स्वभावसे ही (उसका चरित्र देखकर) हो जाती है ॥ ३ ॥

अनुचित आजु कहब अस मोरा । सोक सनेहँ सयानप थोरा ॥ सुनि सुरसरि सम पावनि बानी । भई सनेह बिकल सब रानी ॥

किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है। शोक और स्नेहमें सयानापन (विवेक) कम हो जाता है (लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरतकी बड़ाई कर रही हूँ)। कौसल्याजीकी गङ्गाजीके समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियाँ स्नेहके मारे विकल हो उठीं ॥ ४ ॥

दो०—कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देवि मिथिलेसि । को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकड़ उपदेसि ॥ २८३ ॥

कौसल्याजीने फिर धीरज धरकर कहा—हे देवि मिथिलेश्वरी! सुनिये, ज्ञानके भण्डार श्रीजनकजीकी प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है? ॥ २८३ ॥

रानि राय सन अवसरु पाई । अपनी भाँति कहब समुझाई ॥ रखिअहिं लखनु भरतु गवनिहिं बन । जौँ यह मत मानै महीप मन ॥