श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
पिता जनकजीने तो स्नेहसे सच्ची सुन्दर वाणी कही। परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोचमें समा गयीं। पिता-माताने उन्हें फिर हृदयसे लगा लिया और हितभरी सुन्दर सीख और आशिष दी ॥ ३ ॥
कहति न सीय सकुचि मन माहीं । इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं ॥ लखि रुख रानि जनायउ राऊ । हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ ॥
सीताजी कुछ कहती नहीं हैं, परन्तु मनमें सकुचि रही हैं कि रातमें [सासुओंकी सेवा छोड़कर] यहाँ रहना अच्छा नहीं है। रानी सुनयनाजीने जानकीजीका रुख देखकर (उनके मनकी बात समझकर) राजा जनकजीको जना दिया। तब दोनों अपने हृदयोंमें सीताजीके शील और स्वभावकी सराहना करने लगे ॥ ४ ॥
दो०—बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि ।
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि ॥ २८७ ॥
राजा-रानीने बार-बार मिलकर और हृदयसे लगाकर तथा सम्मान करके सीताजीको विदा किया। चतुर रानीने समय पाकर राजासे सुन्दर वाणीमें भरतजीकी दशाका वर्णन किया ॥ २८७ ॥
सुनि भूपाल भरत व्यवहारू । सोन सुगंध सुधा ससि सारू ॥ मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजसु सराहन लगे मुदित मन ॥
सोनेमें सुगंध और [समुद्रसे निकली हुई] सुधामें चन्द्रमाके सार अमृतके समान भरतजीका व्यवहार सुनकर राजाने [प्रेमविह्वल होकर] अपने [प्रेमाश्रुओंके] जलसे भरे नेत्रोंको मूँद लिया (वे भरतजीके प्रेममें मानो ध्यानस्थ हो गये)। वे शरीरसे पुलकित हो गये और मनमें आनन्दित होकर भरतजीके सुन्दर यशकी सराहना करने लगे ॥ १ ॥
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव बंध बिमोचनि ॥ धरम राजनय ब्रह्मविचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू ॥
[वे बोले—] हे सुमुखि! हे सुनयनी! सावधान होकर सुनो। भरतजीकी कथा संसारके बन्धनसे छुड़ानेवाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार—इन तीनों विषयोंमें अपनी बुद्धिके अनुसार मेरी [थोड़ी-बहुत] गति है (अर्थात् इनके सम्बन्धमें मैं कुछ जानता हूँ) ॥ २ ॥
सो मति मोरि भरत महिमाही । कहै काह छलि छुअति न छाँही ॥ बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद ॥
वह (धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञानमें प्रवेश रखनेवाली) मेरी बुद्धि भरतजीकी महिमाका वर्णन तो क्या करे, छल करके भी उसकी छायातकको नहीं छू पाती! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान्— ॥ ३ ॥