श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 588, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
दो०—भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ ॥ २८९ ॥
राजाने बिलखकर (प्रेमसे गद्द होकर) कहा—भरतजी भूलकर भी श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाको मनसे भी नहीं टालेंगे। अतः स्नेहके वश होकर चिन्ता नहीं करनी चाहिये ॥ २८९ ॥
राम भरत गुन गनत सप्रीती । निसि दंपतिहि पलक सम बीती ॥ राज समाज प्रात जुग जागे । न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे ॥
श्रीरामजी और भरतजीके गुणोंकी प्रेमपूर्वक गणना करते (कहते-सुनते) पति-पत्नीको रात पलकके समान बीत गयी। प्रातःकाल दोनों राजसमाज जागे और नहा-नहाकर देवताओंकी पूजा करने लगे ॥ १ ॥
गे नहाइ गुर पहिं रघुराई । बंदि चरन बोले रुख पाई ॥ नाथ भरतु पुरजन महतारी । सोक बिकल बनबास दुखारी ॥
श्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वसिष्ठजीके पास गये और चरणोंकी वन्दना करके उनका रुख पाकर बोले—हे नाथ! भरत, अवधपुरवासी तथा मातार्णु, सब शोकसे व्याकुल और वनवाससे दुखी हैं ॥ २ ॥
सहित समाज राउ मिथिलेसू । बहुत दिवस भए सहत कलेसू ॥ उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा । हित सबही कर रौं हथ्या ॥
मिथिलापति राजा जनकजीको भी समाजसहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गये। इसलिये हे नाथ! जो उचित हो वही कीजिये। आपहीके हाथ सभीका हित है ॥ ३ ॥
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ । मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ ॥ तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा । नरक सरिस दुहु राज समाजा ॥
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये। उनका शील-स्वभाव देखकर [प्रेम और आनन्दसे] मुनि वसिष्ठजी पुलकित हो गये। [उन्होंने खुलकर कहा—] हे राम! तुम्हारे बिना [घर-बार आदि] सम्पूर्ण सुखोंके साज दोनों राजसमाजोंको नरकके समान हैं ॥ ४ ॥
दो०—प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम ॥ २९० ॥
हे राम! तुम प्राणोंके भी प्राण, आत्माके भी आत्मा और सुखके भी सुख हो। हे तात! तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उन्हें विधाता विपरीत है ॥ २९० ॥