सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 1058 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 590

५८८

  • रामचरितमानस *

राजा दशरथजीने श्रीरामजीको वन जानेके लिये कहा और स्वयं अपने प्रियके प्रेमको प्रमाणित (सच्चा) कर दिया (प्रियवियोगमें प्राण त्याग दिये)। परन्तु हम अब इन्हें वनसे [और गहन] वनको भेजकर अपने विवेककी बड़ाईमें आनन्दित होते हुए लौटेंगे [कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजीको वनमें छोड़कर चले आये, दशरथजीकी तरह मरे नहीं!] ॥ २ ॥

तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी ॥ समउ समुद्धि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा ॥

तपस्वी, मुनि और ब्राह्मण यह सब सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गये। समयका विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरतजीके पास चले ॥ ३ ॥

भरत आइ आगें भड़ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे ॥ तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ ॥

भरतजीने आकर उन्हें आगे होकर लिया (सामने आकर उनका स्वागत किया) और समयानुकूल अच्छे आसन दिये। तिरहुतराज जनकजी कहने लगे—हे तात भरत! तुमको श्रीरामजीका स्वभाव मालूम ही है ॥ ४ ॥

दो०—राम सत्यव्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।

संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ॥ २९२ ॥

श्रीरामचन्द्रजी सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील और स्नेह रखनेवाले हैं। इसीलिये वे संकोचवश संकट सह रहे हैं; अब तुम जो आज्ञा दो, वह उनसे कही जाय ॥ २९२ ॥

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी ॥ प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू ॥

भरतजी यह सुनकर पुलकितशरीर हो नेत्रोंमें जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले—हे प्रभो! आप हमारे पिताके समान प्रिय और पूज्य हैं। और कुलगुरु श्रीवसिष्ठजीके समान हितैषी तो माता-पिता भी नहीं हैं ॥ १ ॥

कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू ॥ सिसु सेवकु आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी ॥

विश्वामित्रजी आदि मुनियों और मन्त्रियोंका समाज है। और आजके दिन ज्ञानके समुद्र आप भी उपस्थित हैं। हे स्वामी! मुझे अपना बच्चा, सेवक और आज्ञानुसार चलनेवाला समझकर शिक्षा दीजिये ॥ २ ॥

एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर ॥ छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता ॥