श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 592, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
यह समाचार सुनकर सब लोग सोचसे व्याकुल हो गये; जैसे नये (पहली वर्षाके) जलके संयोगसे मछलियाँ व्याकुल होती हैं। देवताओंने पहले कुलगुरु वसिष्ठजीकी [प्रेमविह्वल] दशा देखी, फिर विदेहजीके विशेष स्नेहको देखा; ॥ ३ ॥
राम भगतिमय भरतु निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ॥ सब कोउ राम पेममय पेखा । भए अलेख सोच बस लेखा ॥
और तब श्रीरामभक्तिसे ओतप्रोत भरतजीको देखा। इन सबको देखकर स्वार्थी देवता घबड़ाकर हृदयमें हार मान गये (निराश हो गये)। उन्होंने सब किसीको श्रीरामप्रेममें सराबोर देखा। इससे देवता इतने सोचके वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं ॥ ४ ॥
दो०—रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु ।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ॥ २९४ ॥
देवराज इन्द्र सोचमें भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्नेह और संकोचके वशमें हैं। इसलिये सब लोग मिलकर कुछ प्रपञ्च (माया) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा [ही समझो] ॥ २९४ ॥
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही । देबि देव सरनागत पाही ॥ फेरि भरत मति करि निज माया । पालु बिबुध कुल करि छल छाया ॥
देवताओंने सरस्वतीका स्मरण कर उनकी सराहना (स्तुति) की और कहा—हे देवि! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजीकी बुद्धिको फेर दीजिये। और छलकी छाया कर देवताओंके कुलका पालन (रक्षा) कीजिये ॥ १ ॥
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी । बोली सुर स्वारथ जड़ जानी ॥ मो सन कहहु भरत मति फेरू । लोचन सहस न सूझ सुमेरू ॥
देवताओंकी विनती सुनकर और देवताओंको स्वार्थके वश होनेसे मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोली—मुझसे कह रहे हो कि भरतजीकी मति पलट दो! हजार नेत्रोंसे भी तुमको सुमेरू नहीं सूझ पड़ता! ॥ २ ॥
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी । सोउ न भरत मति सकड़ निहारी ॥ सो मति मोहि कहत करु भोरी । चंदिनि कर कि चंडकर चोरी ॥
ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजीकी बुद्धिकी ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धिको, तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो (भुलावेमें डाल दो) ! अरे! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्यको चुरा सकती है? ॥ ३ ॥
भरत हृदयँ सिय राम निवासू । तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू ॥ अस कहि सारद गड़ बिधि लोका । बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका ॥