श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 600, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जासु बिलोकि भगति लवल्लेसू । प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू ॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी । भगति सुभायै सुमति हियै हुलसी ॥
जिनकी भक्तिका लवल्लेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये, उन भरतजीकी महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे [कविके] हृदयमें सुबुद्धि हुलस रही है (विकसित हो रही है) ॥ ३ ॥
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी । कबिकुल कानि मानि सकुचानी ॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई । मति गति बाल बचन की नाई ॥
परन्तु वह बुद्धि अपनेको छोटी और भरतजीकी महिमाको बड़ी जानकर कविपरम्पराकी मर्यादाको मानकर सकुचा गयी (उसका वर्णन करनेका साहस नहीं कर सकी)। उसकी गुणोंमें रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धिकी गति बालकके वचनोंकी तरह हो गयी (वह कुण्ठित हो गयी) ॥ ४ ॥
दो०— भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि ॥ ३०३ ॥
भरतजीका निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कविकी सुबुद्धि चकोरी है, जो भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें उस चन्द्रमाको उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है [तब उसका वर्णन कौन करे?] ॥ ३०३ ॥
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ । लघु मति चापलता कबि छमहूँ ॥
कहत सुनत सति भाउ भरत को । सीय राम पद होइ न रत को ॥
भरतजीके स्वाभावका वर्णन वेदोंके लिये भी सुगम नहीं है। [अतः] मेरी तुच्छ बुद्धिकी चञ्चलताको कविलोग क्षमा करें! भरतजीके सद्भावको कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजीके चरणोंमें अनुरक्त न हो जायगा ॥ १ ॥
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को । जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को ॥
देखि दयाल दसा सबही की । राम सुजान जानि जन जी की ॥
भरतजीका स्मरण करनेसे जिसको श्रीरामजीका प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजीने सभीकी दशा देखकर और भक्त (भरतजी) के हृदयकी स्थिति जानकर, ॥ २ ॥
धरम धुरीन धीर नय नागर । सत्य सनेह सील सुख सागर ॥
देसु कालु लखि समउ समाजू । नीति प्रीति पालक रघुराजू ॥