श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 602, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
दो०— राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम ।
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ॥ ३०५ ॥
राज्यका सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर—इन सभीका पालन (रक्षण) गुरुजीका प्रभाव (सामर्थ्य) करेगा और परिणाम शुभ होगा ॥ ३०५ ॥
सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुर प्रसाद रखवारा ॥
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू ॥
गुरुजीका प्रसाद (अनुग्रह) ही घरमें और वनमें समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है । माता, पिता, गुरु और स्वामीकी आज्ञा [का पालन] समस्त धर्मरूपी पृथ्वीको धारण करनेमें शेषजीके समान है ॥ १ ॥
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू । तात तरनिकुल पालक होहू ॥
साधक एक सकल सिधि देनी । कीरति सुगति भूतिमय बेनी ॥
हे तात! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुलके रक्षक बनो । साधकके लिये यह एक ही (आज्ञापालनरूपी साधना) सम्पूर्ण सिद्धियोंकी देनेवाली, कीर्तिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है ॥ २ ॥
सो बिचारि सहि संकटु भारी । करहु प्रजा परिवारु सुखारी ॥
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई ॥
इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवारको सुखी करो । हे भाई! मेरी विपत्ति सभीने बाँट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि (चौदह वर्ष)—तक बड़ी कठिनाई है (सबसे अधिक दुःख है) ॥ ३ ॥
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा । कुसमयँ तात न अनुचित मोरा ॥
होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए । ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए ॥
तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर (वियोगकी बात) कह रहा हूँ । हे तात! बुरे समयमें मेरे लिये यह कोई अनुचित बात नहीं है । कुठौर (कुअवसर) में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं । वज्रके आघात भी हाथसे ही रोके जाते हैं ॥ ४ ॥
दो०— सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥ ३०६ ॥
सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान और स्वामी मुखके समान होना चाहिये । तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक-स्वामीकी ऐसी प्रीतिकी रीति सुनकर सुकबि उसकी सराहना करते हैं ॥ ३०६ ॥