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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 608

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  • रामचरितमानस *

[अगले छठे दिन] सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करनेके लिये अच्छा दिन है, यह मनमें जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहनेमें सकुचा रहे हैं ॥ १ ॥

गुर नृप भरत सभा अवलोकी । सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी ॥ सील सराहि सभा सब सोची । कहँ न राम सम स्वामि सँकोची ॥

श्रीरामचन्द्रजीने गुरु वसिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभाकी ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वीकी ओर ताकने लगे। सभा उनके शीलकी सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजीके समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं ॥ २ ॥

भरत सुजान राम रुख देखी । उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी ॥ करि दंडवत कहत कर जोरी । राखीं नाथ सकल रुचि मोरी ॥

सुजान भरतजी श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेषरूपसे धीरज धारणकर दण्डवत् करके हाथ जोड़कर कहने लगे—हे नाथ! आपने मेरी सभी रुचियाँ रहीं ॥ ३ ॥

मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू । बहुत भाँति दुखु पावा आपू ॥ अब गोसाईं मोहि देउ रजाई । सेवौं अवध अवधि भरि जाई ॥

मेरे लिये सब लोगोंने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत प्रकारसे दुःख पाया। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें। मैं जाकर अवधिभर (चौदह वर्षतक) अवधका सेवन करूँ ॥ ४ ॥

दो०—जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल ।

सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ॥ ३१३ ॥

हे दीनदयाल! जिस उपायसे यह दास फिर चरणोंका दर्शन करे—हे कोसलाधीश! हे कृपालु! अवधिभरके लिये मुझे वही शिक्षा दीजिये ॥ ३१३ ॥

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं । सब सुचि सरस सनेहैं सगाईं ॥ राउर बदि भल भव दुख दाहू । प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ॥

हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्धसे अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनन्द) से युक्त हैं। आपके लिये भवदुःख (जन्म-मरणके दुःख) की ज्वालामें जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है ॥ १ ॥

स्वामि सुजानु जानि सब ही की । रुचि लालसा रहनि जन जी की ॥ प्रनतपालु पालिहि सब काहू । देउ दुहू दिसि ओर निबाहू ॥