श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 612, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
जहाँ जनक गुर गति मति भोरी । प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ॥ बरनत रघुबर भरत बियोगू । सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू ॥
जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको प्राकृत (लौकिक) कहनेमें बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहृदय समझेंगे ॥ १ ॥
सो सकोच रसु अकथ सुबानी । समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी ॥ भेंटि भरतु रघुबर समुझाए । पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए ॥
वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगा लिया ॥ २ ॥
सेवक सचिव भरत रुख पाई । निज निज काज लगे सब जाई ॥ सुनि दारुन दुखु दुहुँ समाजा । लगे चलन के साजन साजा ॥
सेवक और मन्त्री भरतजीका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजोंमें दारुण दुःख छा गया। वे चलनेकी तैयारियाँ करने लगे ॥ ३ ॥
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई । चले सीस धरि राम रजाई ॥ मुनि तापस बनदेव निहोरी । सब सनमानि बहोरि बहोरी ॥
प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके तथा श्रीरामजीकी आज्ञाको सिरपर रखकर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की ॥ ४ ॥
दो०—लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि ॥ ३१८ ॥
फिर लक्ष्मणजीको क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजीके चरणोंकी धूलिको सिरपर धारण करके और समस्त मङ्गलोंके मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले ॥ ३१८ ॥
सानुज राम नृपहि सिर नाई । कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई ॥ देव दया बस बड़ दुखु पायउ । सहित समाज काननहिं आयउ ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत श्रीरामजीने राजा जनकजीको सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकारसे विनती और बड़ाई की [और कहा—] हे देव! दयावश आपने बहुत दुःख पाया। आप समाजसहित वनमें आये ॥ १ ॥
पुर पगु धारिअ देड़ असीसा । कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा ॥ मुनि महिदेव साधु सनमाने । बिदा किए हरि हर सम जाने ॥