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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 623, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 623
  • अरण्यकाण्ड *

६२१

श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनोंपर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणोंके घर मूर्ख जयन्तने आकर छल किया ॥ १ ॥

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा । चला भाजि बायस भय पावा ॥ धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं । राम बिमुख राखा तेहि नाहीं ॥

मन्त्रसे प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्रके पास गया, पर श्रीरामजीका विरोधी जानकर इन्द्रने उसको नहीं रखा ॥ १ ॥

भा निरास उपजी मन त्रासा । जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा ॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका । फिरा श्रमित व्याकुल भय सोका ॥

तब वह निराश हो गया, उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया; जैसे दुर्बासा ऋषिको चक्रसे भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकोंमें थका हुआ और भय-शोकसे व्याकुल होकर भागता फिरा ॥ २ ॥

काहूँ बैठन कहा न ओही । राखि को सकड़ राम कर द्रोही ॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना । सुधा होड़ बिष सुनु हरिजाना ॥

[पर रखना तो दूर रहा] किसीने उसे बैठनेतकके लिये नहीं कहा। श्रीरामजीके द्रोहीको कौन रख सकता है? [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्युके समान, पिता यमराजके समान और अमृत विषके समान हो जाता है ॥ ३ ॥

मित्र करड़ सत रिपु कै करनी । ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी ॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता । जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥

मित्र सैकड़ों शत्रुओंकी-सी करनी करने लगता है। देवनदी गङ्गाजी उसके लिये वैतरणी (यमपुरीकी नदी) हो जाती है। हे भाई! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजीके विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्निये भी अधिक गरम (जलानेवाला) हो जाता है ॥ ४ ॥

नारद देखा बिकल जयंता । लागि दया कोमल चित संता ॥ पठवा तुरत राम पहिं ताही । कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही ॥

नारदजीने जयन्तको व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतोंका चित बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे [समझाकर] तुरंत श्रीरामजीके पास भेज दिया। उसने [जाकर] पुकारकर कहा— हे शरणागतके हितकारी! मेरी रक्षा कीजिये ॥ ५ ॥

आतुर सभय गहेसि पद जाई । त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई । मैं मतिमंद जानि नहिं पाई ॥