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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 632, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 632

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  • रामचरितमानस *

दो०—सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम। मम हिउँ बसहु निरंतर सगुनरूप श्रीराम ॥ ८ ॥

हे नीले मेघके समान श्याम शरीरवाले सगुनरूप श्रीरामजी! सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभु (आप) निरन्तर मेरे हृदयमें निवास कीजिये ॥ ८ ॥

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा ॥ ताते मुनि हरि लीन न भयऊ । प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ ॥

ऐसा कहकर शरभंगजीने योगाग्निसे अपने शरीरको जला डाला और श्रीरामजीकी कृपासे वे वैकुण्ठको चले गये। मुनि भगवान्में लीन इसलिये नहीं हुए कि उन्होंने पहले ही भेद-भक्तिका वर ले लिया था ॥ १ ॥

रिषि निकाय मुनिबर गति देखी । सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी ॥ अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा । जयति प्रनत हित करुना कंदा ॥

ऋषिसमूह मुनिश्रेष्ठ शरभंगजीकी यह [दुर्लभ] गति देखकर अपने हृदयमें विशेषरूपसे सुखी हुए। समस्त मुनिवृन्द श्रीरामजीकी स्तुति कर रहे हैं [और कह रहे हैं] शरणागतहितकारी करुणाकन्द (करुणाके मूल) प्रभुकी जय हो! ॥ २ ॥

पुनि रघुनाथ चले बन आगे । मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे ॥ अस्थि समूह देखि रघुराया । पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया ॥

फिर श्रीरघुनाथजी आगे वनमें चले। श्रेष्ठ मुनियोंके बहुत-से समूह उनके साथ हो लिये। हड़ियोंका ढेर देखकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी दया आयी, उन्होंने मुनियोंसे पूछा ॥ ३ ॥

जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी । सबदरसी तुम्ह अंतरजामी ॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए । मुनि रघुबीर नयन जल छाए ॥

[मुनियोंने कहा—] हे स्वामी! आप सर्वदर्शी (सर्वज्ञ) और अन्तर्यामी (सबके हृदयकी जाननेवाले) हैं। जानते हुए भी [अनजानकी तरह] हमसे कैसे पूछ रहे हैं? राक्षसोंके दलोंने सब मुनियोंको खा डाला है [ये सब उन्हींकी हड़ियोंके ढेर हैं]। यह सुनते ही श्रीरघुवीरके नेत्रोंमें जल छा गया (उनकी आँखोंमें करुणाके आँसू भर आये) ॥ ४ ॥

दो०—निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह ॥ ९ ॥

श्रीरामजीने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वीको राक्षसोंसे रहित कर दूँगा। फिर समस्त मुनियोंके आश्रमोंमें जा-जाकर उनको [दर्शन एवं सम्भाषणका] सुख दिया ॥ ९ ॥