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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 641
  • अरण्यकाण्ड *

६३१

पक्षी और पशुओंके समूह आनन्दित रहते हैं और भौर मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं। जहाँ प्रत्यक्ष श्रीरामजी विराजमान हैं, उस वनका वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते ॥ २ ॥

एक बार प्रभु सुख आसीना । लछिमन बचन कहे छलहीना ॥ सुर नर मुनि सचराचर साईं । मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं ॥

एक बार प्रभु श्रीरामजी सुखसे बैठे हुए थे। उस समय लक्ष्मणजीने उनसे छलरहित (सरल) वचन कहे—हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचरके स्वामी! मैं अपने प्रभुकी तरह (अपना स्वामी समझकर) आपसे पूछता हूँ ॥ ३ ॥

मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा । सब तजि करौं चरन रज सेवा ॥ कहहु ग्यान बिराग अरु माया । कहहु सो भगति करहु जेहिं दया ॥

हे देव! मुझे समझाकर वही कहिये, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरजकी ही सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और मायाका वर्णन कीजिये; और उस भक्तिको कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं ॥ ४ ॥

दो०—ईश्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौं समुझाइ । जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ ॥ १४ ॥

हे प्रभो! ईश्वर और जीवका भेद भी सब समझाकर कहिये, जिससे आपके चरणोंमें मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जायँ ॥ १४ ॥

थोरेहि महाँ सब कहउँ बुझाई । सुनहु तात मति मन चित लाई ॥ मैं अरु मोर तोर तैं माया । जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ॥

(श्रीरामजीने कहा—) हे तात! मैं थोड़ेहीमें सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित और बुद्धि लगाकर सुनो। मैं और मेरा, तू और तेरा—यही माया है, जिसने समस्त जीवोंको वशमें कर रखा है ॥ १ ॥

गो गोचर जहाँ लगि मन जाई । सो सब माया जानेहु भाई ॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ । बिद्या अपर अविद्या दोऊ ॥

इन्द्रियोंके विषयोंको और जहाँतक मन जाता है, हे भाई! उस सबको माया जानना। उसके भी—एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदोंको तुम सुनो— ॥ २ ॥

एक दृष्ट अतिसय दुखरूपा । जा बस जीव परा भवकूपा ॥ एक रचइ जग गुन बस जाकेँ । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकेँ ॥