श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 647, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अरण्यकाण्ड *
६४५
‘पकड़ो-पकड़ो’ पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग छोड़कर (बड़ी तेजीसे) दौड़े हुए आये [और उन्होंने श्रीरामजीको चारों ओरसे घेर लिया], जैसे बालसूर्य (उदयकालीन सूर्य) को अकेला देखकर मन्देह नामक दैत्य घेर लेते हैं ॥ १८ ॥
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी । थकित भई रजनीचर धारी ॥ सचिव बोलि बोले खर दूषण । यह कोउ नृपबालक नर भूषण ॥
[सौन्दर्य-माधुर्यनिधि] प्रभु श्रीरामजीको देखकर राक्षसोंकी सेना थकित रह गयी। वे उनपर बाण नहीं छोड़ सके। मन्त्रीको बुलाकर खर-दूषणने कहा—यह राजकुमार कोई मनुष्योंका भूषण है ॥ १ ॥
नाग असुर सुर नर मुनि जेते । देखे जिते हते हम केते ॥ हम भरि जन्म सुनहु सब भाई । देखी नहिं असि सुंदरताई ॥
जितने भी नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि हैं, उनमेंसे हमने न जाने कितने ही देखे, जीते और मार डाले हैं। पर हे सब भाइयो! सुनो, हमने जन्मभरमें ऐसी सुन्दरता कहीं नहीं देखी ॥ २ ॥
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा । बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥ देहु तुरत निज नारि दुराई । जीअत भवन जाहु द्वौ भाई ॥
जद्यपि इन्होंने हमारी बहिनको कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं। ‘छिपायी हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते—जी घर लौट जाओ’ ॥ ३ ॥
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु । तासु बचन सुनि आतुर आवहु ॥ दूतन्ह कहा राम सन जाई । सुनत राम बोले मुसुकाई ॥
मेरा यह कथन तुमलोग उसे सुनाओ और उसका वचन (उत्तर) सुनकर शीघ्र आओ। दूतोंने जाकर यह सन्देश श्रीरामचन्द्रजीसे कहा। उसे सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मुसकराकर बोले— ॥ ४ ॥
हम छत्री मृगया बन करहीं । तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं ॥ रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं । एक बार कालहु सन लरहीं ॥
हम क्षत्रिय हैं, वनमें शिकार करते हैं और तुम्हारे-सरीखे दुष्ट पशुओंको तो ढूँढ़ते ही फिरते हैं। हम बलवान् शत्रुको देखकर नहीं डरते। [लड़नेको आवे तो] एक बार तो हम कालसे भी लड़ सकते हैं ॥ ५ ॥
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक । मुनि पालक खल सालक बालक ॥ जौं न होइ बल घर फिरि जाहू । समर बिमुख मैं हतउँ न काहू ॥