श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 651, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अरण्यकाण्ड *
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सब [‘यही राम हैं, इसे मारो’ इस प्रकार ] राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं। कृपानिधान श्रीरामजीने यह उपाय करके क्षणभरमें शत्रुओंको मार डाला ॥ २० (क) ॥
हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान ।
अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान ॥ २० (ख) ॥
देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। फिर वे सब स्तुति कर-करके अनेकों विमानोंपर सुशोभित हुए चले गये ॥ २० (ख) ॥
जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥ तब लछिमन सीतहि लै आए । प्रभु पद परत हरषि उर लाए ॥
जब श्रीरघुनाथजीने युद्धमें शत्रुओंको जीत लिया तथा देवता, मनुष्य और मुनि सबके भय नष्ट हो गये, तब लक्ष्मणजी सीताजीको ले आये। चरणोंमें पड़ते हुए उनको प्रभुने प्रसन्नतापूर्वक उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥
सीता चित्तव स्याम मृदु गाता । परम प्रेम लोचन न अघाता ॥ पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक । करत चरित सुर मुनि सुरखदायक ॥
सीताजी श्रीरामजीके श्याम और कोमल शरीरको परम प्रेमके साथ देख रही हैं, नेत्र अघाते नहीं हैं। इस प्रकार पञ्चवटीमें बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियोंको सुख देनेवाले चरित्र करने लगे ॥ २ ॥
धुआँ देखि खरदूषन केरा । जाड़ सुपनखाँ रावन प्रेरा ॥ बोली बचन क्रोध करि भारी । देस कोस कै सुरति बिसारी ॥
खर-दूषणका विध्वंस देखकर शूर्पणखाने जाकर रावणको भड़काया। वह बड़ा क्रोध करके वचन बोली—तूने देश और खजानेकी सुधि ही भुला दी ॥ ३ ॥
करसि पान सोवसि दिनु राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥ राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥ बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ । श्रम फल पढ़ें किऐँ अरु पाएँ ॥ संग तें जती कुमंत्र ते राजा । मान ते ग्यान पान तें लाजा ॥
शराब पी लेता है और दिन-रात पढ़ा सोता रहता है। तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिरपर खड़ा है? नीतिके बिना राज्य और धर्मके बिना धन प्राप्त करनेसे, भगवान्को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करनेसे और विवेक उत्पन्न किये बिना विद्या पढ़नेसे परिणाममें श्रम ही हाथ लगता है। विषयोंके सङ्गसे संन्यासी, बुरी सलाहसे राजा, मानसे ज्ञान, मदिरापानसे लज्जा, ॥ ४-५ ॥