श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 659, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- अरण्यकाण्ड *
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जाहु बेगि संकट अति भ्राता । लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ॥ भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहुँ संकट परड़ कि सोई ॥
तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकटमें हैं। लक्ष्मणजीने हँसकर कहा—हे माता! सुनो, जिनके भृकुटिविलास (भौंके इशारे) मात्रसे सारी सृष्टिका लय (प्रलय) हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वप्नमें भी संकटमें पड़ सकते हैं? ॥ २ ॥
मरम बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ॥ बन दिसि देव सौँपि सब काहू । चले जहाँ रावन ससि राहू ॥
इसपर जब सीताजी कुछ मर्म-वचन (हृदयमें चुभनेवाले वचन) कहने लगीं, तब भगवान्की प्रेरणासे लक्ष्मणजीका मन भी चञ्चल हो उठा। वे श्रीसीताजीको वन और दिशाओंके देवताओंको सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावणरूपी चन्द्रमाके लिये राहुरूप श्रीरामजी थे ॥ ३ ॥
सून बीच दसकंधर देखा । आवा निकट जती कें बेषा ॥ जाकें डर सुर असुर डेराहीं । निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं ॥
रावण सूना मौका देखकर यति (संन्यासी) के वेषमें श्रीसीताजीके समीप आया। जिसके डरसे देवता और दैत्यतक इतना डरते हैं कि रातको नींद नहीं आती और दिनमें [भरपेट] अन्न नहीं खाते— ॥ ४ ॥
सो दससीस स्वान की नाई । इत उत चितइ चला भड़िहाई ॥ इमि कुपंथ पग देत खगेसा । रह न तेज तन बुधि बल लेसा ॥
वही दस सिरवाला रावण कुत्तेकी तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई* (चोरी) के लिये चला। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! इस प्रकार कुमार्गपर पैर रखते ही शरीरमें तेज तथा बुद्धि एवं बलका लेश भी नहीं रह जाता ॥ ५ ॥
- सूना पाकर कुत्ता चुपके-से बर्तन-भाड़ोंमें मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है उसे, 'भड़िहाई' कहते हैं।
नाना बिधि करि कथा सुहाई । राजनीति भय प्रीति देखाई ॥ कह सीता सुनु जती गोसाई । बोलेहु बचन दुष्ट की नाई ॥
रावणने अनेकों प्रकारकी सुहावनी कथाएँ रचकर सीताजीको राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया। सीताजीने कहा—हे यति गोसाई! सुनो, तुमने तो दुष्टकी तरह बचन कहे ॥ ६ ॥
तब रावन निज रूप देखावा । भई सभय जब नाम सुनावा ॥ कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा । आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा ॥