श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 666, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
बलमप्रमेयमनादिमजमव्यक्तमेकमगोचरं । गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं ॥ जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं । नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं ॥ २ ॥
आप अपरिमित बलवाले हैं, अनादि, अजन्मा, अव्यक्त (निराकार), एक, अगोचर (अलक्ष्य), गोविन्द (वेदवाक्योंद्वारा जाननेयोग्य), इन्द्रियोंसे अतीत, [जन्म-मरण, सुख-दुःख, हर्ष-शोकादि] द्वन्द्वोंको हरनेवाले, विज्ञानकी घनमूर्ति और पृथ्वीके आधार हैं तथा जो संत राम-मन्त्रको जपते हैं, उन अनन्त सेवकोंके मनको आनन्द देनेवाले हैं। उन निष्कामप्रिय (निष्कामजनोंके प्रेमी अथवा उन्हें प्रिय) तथा काम आदि दुष्टों (दुष्ट-वृत्तियों) के दलका दलन करनेवाले श्रीरामजीको मैं नित्य नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म व्यापक बिरज अज कहि गावहीं । करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं ॥ सो प्रगट करुना कंद सोभा बूंद अग जग मोहई । मम हृदय पंकज भूंग अंग अनंग बहु छवि सोहई ॥ ३ ॥
जिनको श्रुतियाँ निरञ्जन (मायासे परे), ब्रह्म, व्यापक, निर्विकार और जन्मरहित कहकर गान करती हैं। मुनि जिन्हें ध्यान, ज्ञान, वैराग्य और योग आदि अनेक साधन करके पाते हैं। वे ही करुणाकन्द, शोभाके समूह [स्वयं श्रीभगवान्] प्रकट होकर जड़-चेतन समस्त जगत्को मोहित कर रहे हैं। मेरे हृदय-कमलके भ्रमररूप उनके अंग-अंगमें बहुत-से कामदेवोंकी छवि शोभा पा रही है ॥ ३ ॥
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा । परस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा ॥ सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी । मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी ॥ ४ ॥
जो अगम और सुगम हैं, निर्मलस्वभाव हैं, विषम और सम हैं और सदा शीतल (शान्त) हैं। मन और इन्द्रियोंको सदा वशमें करते हुए योगी बहुत साधन करनेपर जिन्हें देख पाते हैं, वे तीनों लोकोंके स्वामी, रमानिवास श्रीरामजी निरन्तर अपने दासोंके वशमें रहते हैं, वे ही मेरे हृदयमें निवास करें, जिनकी पवित्र कीर्ति आवागमनको मिटानेवाली है ॥ ४ ॥