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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 672, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 672

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  • रामचरितमानस *

और स्त्रीको चाहे हृदयमें ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसीके वशमें नहीं रहते। हे तात! इस सुन्दर वसन्तको तो देखो। प्रियाके बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है ॥ ५ ॥

दो०—बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।

सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल ॥ ३७ ( क ) ॥

मुझे विरहसे व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेवने वन, भौरों और पक्षियोंको साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया ॥ ३७ ( क ) ॥

देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।

डेरा कीन्हेटु मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात ॥ ३७ ( ख ) ॥

परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाईके साथ हूँ (अकेला नहीं हूँ), तब उसकी बात सुनकर कामदेवने मानो सेनाको रोककर डेरा डाल दिया है ॥ ३७ ( ख ) ॥

बिटप बिसाल लता अरुझानी । बिबिध बितान दिए जनु तानी ॥

कदलि ताल बर धुजा पताका । देखि न मोह धीर मन जाका ॥

विशाल वृक्षोंमें लताएँ उलझी हुई ऐसी मालूम होती हैं मानो नाना प्रकारके तंबू तान दिये गये हैं। केला और ताड़ सुन्दर ध्वजा-पताकाके समान हैं। इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता जिसका मन धीर है ॥ १ ॥

बिबिध भाँति फूले तरु नाना । जनु बनैत बने बहु बाना ॥

कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए । जनु भट बिलग बिलग होइ छाए ॥

अनेकों वृक्ष नाना प्रकारसे फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना (वर्दी) धारण किये हुए बहुत-से तीरंदाज हों। कहीं-कहीं सुन्दर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धालोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों ॥ २ ॥

कूजत पिक मानहुँ गज माते । ठेक महोख ऊंट बिसराते ॥

मोर चकोर कीर बर बाजी । पारावत मराल सब ताजी ॥

कोयलें कूज रही हैं, वही मानो मतवाले हाथी [चिग्गाड़ रहे] हैं। ठेक और महोख पक्षी मानो ऊंट और खच्चर हैं। मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानो सब सुन्दर ताजी (अरबी) घोड़े हैं ॥ ३ ॥

तीतिर लावक पदचर जूथा । बरनि न जाइ मनोज बरुथा ॥

रथ गिरि सिला दुंदुभीं झरना । चातक बंदी गुन गन बरना ॥