श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 674, कुल 1058 में से
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- रामचरितमानस *
क्रोध, काम, लोभ, मद और माया—ये सभी श्रीरामजीकी दयासे छूट जाते हैं। वह नट (नटराजभगवान्) जिसपर प्रसन्न होता है, वह मनुष्य इन्द्रजाल (माया) में नहीं भूलता ॥ २ ॥
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥ पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा । पंपा नाम सुभग गंभीरा ॥
हे उमा! मैं तुम्हें अपना अनुभव कहता हूँ—हरिका भजन ही सत्य है, यह सारा जगत् तो स्वप्न [की भाँति झूठा] है। फिर प्रभु श्रीरामजी पंपा नामक सुन्दर और गहरे सरोवरके तीरपर गये ॥ ३ ॥
संत हृदय जस निर्मल बारी । बाँधे घाट मनोहर चारी ॥ जहँ तहँ पिअहिँ बिबिध मृग नीरा । जनु उदार गूह जाचक भीरा ॥
उसका जल संतोंके हृदय-जैसा निर्मल है। मनको हरनेवाले सुन्दर चार घाट बँधे हुए हैं। भाँति-भाँतिके पशु जहाँ-तहाँ जल पी रहे हैं। मानो उदार दानी पुरुषोंके घर याचकोंकी भीड़ लगी हो! ॥ ४ ॥
दो०—पुरड़नि सघन ओट जल बेगि न पाड़अ मर्म ।
मायाछन्न न देखिए जैसे निर्गुन ब्रह्म ॥ ३९ (क) ॥
घनी पुरड़नों (कमलके पत्तों)-की आड़में जलका जल्दी पता नहीं मिलता। जैसे मायासे ढके रहनेके कारण निर्गुन ब्रह्म नहीं दीखता ॥ ३९ (क) ॥
सुखी मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिँ ।
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिँ ॥ ३९ (ख) ॥
उस सरोवरके अत्यन्त अथाह जलमें सब मछलियाँ सदा एकरस (एक समान) सुखी रहती हैं। जैसे धर्मशील पुरुषोंके सब दिन सुखपूर्वक बीतते हैं ॥ ३९ (ख) ॥
बिकसे सरसिज नाना रंगा । मधुर मुखर गुंजत बहु भूंगा ॥
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा । प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा ॥
उसमें रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं। बहुत-से भौर मधुर स्वरसे गुंजार कर रहे हैं। जलके मुर्गे और राजहंस बोल रहे हैं, मानो प्रभुको देखकर उनकी प्रशंसा कर रहे हों ॥ १ ॥
चक्रबाक बक खग समुदाई । देखत बनइ बरनि नहिं जाई ॥
सुंदर खग गन गिरा सुहाई । जात पथिक जनु लेत बोलाई ॥
चक्रवाक, बगुले आदि पक्षियोंका समुदाय देखते ही बनता है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर पक्षियोंकी बोली बड़ी सुहावनी लगती है, मानो [रास्तेमें] जाते हुए पथिकको