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श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 676

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  • रामचरितमानस *

(दुःख उठा रहे हैं) ॥ ३ ॥

ऐसे प्रभुहि बिलोकऊँ जाई । पुनि न बनिहि अस अवसरु आई ॥ यह बिचारि नारद कर बीना । गए जहाँ प्रभु सुख आसीना ॥

ऐसे (भक्तवत्सल) प्रभुको जाकर देखूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा। यह विचारकर नारदजी हाथमें वीणा लिये हुए वहाँ गये, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे ॥ ४ ॥

गावत राम चरित मृदु बानी । प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ॥ करत दंडवत लिए उठाई । राखे बहुत बार उर लाई ॥

वे कोमल वाणीसे प्रेमके साथ बहुत प्रकारसे बखान-बखानकर रामचरितका गान कर [ते हुए चले आ] रहे थे। दण्डवत् करते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने नारदजीको उठा लिया और बहुत देरतक हृदयसे लगाये रखा ॥ ५ ॥

स्वागत पूँछि निकट बैठारे । लछिमन सादर चरन पखारे ॥

फिर स्वागत (कुशल) पूछकर पास बैठा लिया। लक्ष्मणजीने आदरके साथ उनके चरण धोये ॥ ६ ॥

दो०—नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि ।

नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि ॥ ४१ ॥

बहुत प्रकारसे विनती करके और प्रभुको मनमें प्रसन्न जानकर तब नारदजी कमलके समान हाथोंको जोड़कर वचन बोले— ॥ ४१ ॥

सुनहु उदार सहज रघुनायक । सुंदर अगम सुगम बर दायक ॥ देहु एक बर मागउँ स्वामी । जद्यपि जानत अंतरजामी ॥

हे स्वभावसे ही उदार श्रीरघुनाथजी! सुनिये। आप सुन्दर अगम और सुगम वरके देनेवाले हैं। हे स्वामी! मैं एक वर माँगता हूँ, वह मुझे दीजिये, यद्यपि आप अन्तर्यामी होनेके नाते सब जानते ही हैं ॥ १ ॥

जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ । जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ ॥ कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी । जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ॥

[श्रीरामजीने कहा—] हे मुनि! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तोंसे कभी कुछ छिपाव करता हूँ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ! तुम नहीं माँग सकते? ॥ २ ॥

जन कहँ कछु अदेय नहिं मोरें । अस बिस्वास तजहु जनि भोरें ॥

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