श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 687, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- किष्किन्धाकाण्ड *
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और हे हनुमान्! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर (जड-चेतन) जगत् मेरे स्वामी भगवान्का रूप है ॥ ३ ॥
देखि पवनसुत पति अनुकूला । हृदयं हरष बीती सब सूला ॥ नाथ सैल पर कपिपति रहई । सो सुग्रीव दास तव अहई ॥
स्वामीको अनुकूल (प्रसन्न) देखकर पवनकुमार हनुमान्जीके हृदयमें हर्ष छा गया और उनके सब दुःख जाते रहे । [उन्होंने कहा—] हे नाथ! इस पर्वतपर वानरराज सुग्रीव रहता है, वह आपका दास है ॥ १ ॥
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे । दीन जानि तेहि अभय करीजे ॥ सो सीता कर खोज कराइहि । जहाँ तहाँ मरकट कोटि पठाइहि ॥
हे नाथ! उससे मित्रता कीजिये और उसे दीन जानकर निर्भय कर दीजिये। वह सीताजीकी खोज करावेगा और जहाँ-तहाँ करोड़ों वानरोंको भेजेगा ॥ २ ॥
एहि बिधि सकल कथा समुझाई । लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई ॥ जब सुग्रीवँ राम कहँ देखा । अतिसय जन्म धन्य करि लेखा ॥
इस प्रकार सब बातें समझाकर हनुमान्जीने (श्रीराम-लक्ष्मण) दोनों जनोंको पीठपर चढ़ा लिया। जब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीको देखा तो अपने जन्मको अत्यन्त धन्य समझा ॥ ३ ॥
सादर मिलेउ नाइ पद माथा । भँटेउ अनुज सहित रघुनाथा ॥ कपि कर मन बिचार एहि रीती । करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती ॥
सुग्रीव चरणोंमें मस्तक नवाकर आदरसहित मिले। श्रीरघुनाथजी भी छोटे भाईसहित उनसे गले लगकर मिले। सुग्रीव मनमें इस प्रकार सोच रहे हैं कि हे विधाता! क्या ये मुझसे प्रीति करेंगे ? ॥ ४ ॥
दो०—तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ ।
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढ़ाइ ॥ ४ ॥
तब हनुमान्जीने दोनों ओरकी सब कथा सुनाकर अग्रिको साक्षी देकर परस्पर दृढ़ करके प्रीति जोड़ दी (अर्थात् अग्रिकी साक्षी देकर प्रतिज्ञापूर्वक उनकी मैत्री करवा दी) ॥ ४ ॥
कीन्हि प्रीति कछु बीच न राखा । लछिमन राम चरित सब भाषा ॥ कह सुग्रीव नयन भरि बारी । मिलिहि नाथ मिथिलेशकुमारी ॥
दोनोनें [हृदयसे] प्रीति की, कुछ भी अन्तर नहीं रखा। तब लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीका सारा इतिहास कहा। सुग्रीवने नेत्रोंमें जल भरकर कहा—हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकीजी मिल जायँगी ॥ १ ॥