श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 689, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- किष्किन्धाकाण्ड *
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वह मायावी एक पर्वतकी गुफामें जा घुसा। तब बालिने मुझे समझाकर कहा—तुम एक पखवाड़े (पंद्रह दिन) तक मेरी बाट देखना। यदि मैं उतने दिनोंमें न आऊँ तो जान लेना कि मैं मारा गया ॥ ३ ॥
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी । निसरी रुधिर धार तहँ भारी ॥ बालि हतेसि मोहि मारिहि आई । सिला देड़ तहँ चलेउँ पराई ॥
हे खरारि! मैं वहाँ महीनेभरतक रहा। वहाँ (उस गुफामेंसे) रक्तकी बड़ी भारी धारा निकली। तब [मैंने समझा कि] उसने बालिको मार डाला, अब आकर मुझे मारेगा। इसलिये मैं वहाँ (गुफाके द्वारपर) एक शिला लगाकर भाग आया ॥ ४ ॥
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साई । दीन्हेउ मोहि राज बरिआई ॥ बाली ताहि मारि गृह आवा । देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा ॥
मन्त्रियोंने नगरको बिना स्वामी (राजा) का देखा, तो मुझको जबर्दस्ती राज्य दे दिया। बालि उसे मारकर घर आ गया। मुझे [राजसिंहासनपर] देखकर उसने जीमें भेद बढ़ाया (बहुत ही विरोध माना)। [उसने समझा कि यह राज्यके लोभसे ही गुफाके द्वारपर शिला दे आया था, जिससे मैं बाहर न निकल सकूँ; और यहाँ आकर राजा बन बैठा] ॥ ५ ॥
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी । हरि लीन्हेसि सर्वसु अरु नारी ॥ ताकें भय रघुवीर कृपाला । सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला ॥
उसने मुझे शत्रुके समान बहुत अधिक मारा और मेरा सर्वस्व तथा मेरी स्त्रीको भी छीन लिया। हे कृपालु रघुवीर! मैं उसके भयसे समस्त लोकोंमें बेहाल होकर फिरता रहा ॥ ६ ॥
इहाँ साप बस आवत नाहीं । तदपि सभीत रहउँ मन माहीं ॥ सुनि सेवक दुख दीनदयाला । फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला ॥
वह शापके कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मनमें भयभीत रहता हूँ। सेवकका दुःख सुनकर दीनोंपर दया करनेवाले श्रीरघुनाथजीकी दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं ॥ ७ ॥
दो०—सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान । ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान ॥ ६ ॥
[उन्होंने कहा—] हे सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाणसे बालिको मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्रकी शरणमें जानेपर भी उसके प्राण न बचेंगे ॥ ६ ॥
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना । मित्रक दुख रज मेरु समाना ॥
जो लोग मित्रके दुःखसे दुःखी नहीं होते, उन्हें देखनेसे ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वतके समान दुःखको धूलके समान और मित्रके धूलके समान दुःखको सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने ॥ १ ॥