श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 699, कुल 1058 में से
संदर्भ में पढ़ें- किष्किन्धाकाण्ड *
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महाबृष्टि चलि फूटि किआरौं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं ॥ कृषी निरावहिं चतुर किसाना । जिमि बुध तजहिं मोह मद माना ॥
भारी वर्षासे खेतोंकी क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होनेसे स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतोंको निरा रहे हैं (उनमेंसे घास आदिको निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मानका त्याग कर देते हैं ॥ ४ ॥
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं । कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं ॥ ऊषर बरषइ तून नहिं जामा । जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा ॥
चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुगको पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसरमें वर्षा होती है, पर वहाँ घासतक नहीं उगती। जैसे हरिभक्तके हृदयमें काम नहीं उत्पन्न होता ॥ ५ ॥
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा । प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा ॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना । जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना ॥
पृथ्वी अनेक तरहके जीवोंसे भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजाकी वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रियाँ [शिथिल होकर विषयोंकी ओर जाना छोड़ देती हैं] ॥ ६ ॥
दो०— कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं ।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं ॥ १५ ( क ) ॥
कभी-कभी वायु बड़े जोरसे चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्रके उत्पन्न होनेसे कुलके उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ( क ) ॥
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग ।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ॥ १५ ( ख ) ॥
कभी [बादलोंके कारण] दिनमें घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है ॥ १५ ( ख ) ॥
बरषा बिगत सरद रिनु आई । लछिमन देखहु परम सुहाई ॥ फूलें कास सकल महि छाई । जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई ॥
हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गयी और परम सुन्दर शरद-ऋतु आ गयी। फूलें हुए काससे सारी पृथ्वी छा गयी। मानो वर्षा-ऋतुने [कासरूपी सफेद बालोंके रूपमें] अपना बुढ़ापा प्रकट किया है ॥ १ ॥
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा । जिमि लोभहि सोषइ संतोषा ॥ सरिता सर निर्मल जल सोहा । संत हृदय जस गत मद मोहा ॥