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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 701, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 701
  • किष्किन्धाकाण्ड *

६१९

भौर अनुपम शब्द करते हुए गँऊ रहे हैं, तथा पक्षियोंके नाना प्रकारके सुन्दर शब्द हो रहे हैं । रात्रि देखकर चकवेके मनमें वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरेकी सम्पत्ति देखकर दुष्टको होता है ॥ २ ॥

चातक रटत तृषा अति ओही । जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही ॥ सरदातप निसि ससि अपहरई । संत दरस जिमि पातक टरई ॥

पपीहा रट लगाये हैं, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशङ्करजीका द्रोही सुख नहीं पाता (सुखके लिये झीखता रहता है) । शरद-ऋतुके तापको रातके समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतोके दर्शनसे पाप दूर हो जाते हैं ॥ ३ ॥

देखि इंदु चकोर समुदाई । चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई ॥ मसक दंस बीते हिम त्रासा । जिमि द्विज द्रोह किऐ कुल नासा ॥

चकोरोंके समुदाय चन्द्रमाको देखकर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्को पाकर उनके [निर्निमेष नेत्रोंसे] दर्शन करते हैं । मच्छर और डॉस जाड़ेके डरसे इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मणके साथ वैर करनेसे कुलका नाश हो जाता है ॥ ४ ॥

दो०—भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।

सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ ॥ १७ ॥

[वर्षा-ऋतुके कारण] पृथ्वीपर जो जीव भर गये थे, वे शरद-ऋतुको पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सदगुरुके मिल जानेपर सन्देह और भ्रमके समूह नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥

बरषा गत निर्मल रितु आई । सुधि न तात सीता कै पाई ॥ एक बार कैसेहुँ सुधि जानौँ । कालहु जीति निमिष महुँ आनौँ ॥

वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद-ऋतु आ गयी । परन्तु हे तात ! सीताकी कोई खबर नहीं मिली । एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो कालको भी जीतकर पलभरमें जानकीको ले आऊँ ॥ १ ॥

कतहुँ रहउ जौँ जीवति होई । तात जतन करि आनउँ सोई ॥ सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी । पावा राज कोस पुर नारी ॥

कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात ! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा । राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिये सुग्रीवने भी मेरी सुधि भुला दी ॥ २ ॥

जेहिं सायक मारा मैं बाली । तेहिं सर हतौँ मूढ़ कहैं काली ॥ जासु कृपा छूटहिं मद मोहा । ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा ॥

जिस बाणसे मैंने बालिको मारा था, उसी बाणसे कल उस मूढ़को मारूँ ! [शिवजी कहते हैं—] हे उमा ! जिनकी कृपासे मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्नमें भी क्रोध हो सकता है ? [यह तो लीलामात्र है] ॥ ३ ॥