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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 712, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 712

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  • रामचरितमानस *

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा । नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा ॥ जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी । तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी ॥

ऋक्षराज जाम्बवान् कहने लगे—मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीरमें पहलेवाले बलका लेश भी नहीं रहा। जब खरारि (खरके शत्रु श्रीराम) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझमें बड़ा बल था ॥ ४ ॥

दो०—बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।

उभय घरी महाँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ ॥ २९ ॥

बलिके बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीरका वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ीमें दौड़कर [उस शरीरकी] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं ॥ २९ ॥

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा । जियँ संसय कछु फिरती बारा ॥

जामवंत कह तुम्ह सब लायक । पठइअ किमि सबही कर नायक ॥

अंगदने कहा—मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समयके लिये हृदयमें कुछ सन्देह है। जाम्बवान्ने कहा—तुम सब प्रकारसे योग्य हो। परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय ? ॥ १ ॥

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना । का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥

पवन तनय बल पवन समाना । बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥

ऋक्षराज जाम्बवान्ने श्रीहनुमान्जीसे कहा—हे हनुमान्! हे बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवनके पुत्र हो और बलमें पवनके समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञानकी खान हो ॥ २ ॥

कवन सो काज कठिन जग माहीं । जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ॥

राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्वताकारा ॥

जगत्में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्रीरामजीके कार्यके लिये ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्जी पर्वतके आकारके (अत्यन्त विशालकाय) हो गये ॥ ३ ॥

कनक बरन तन तेज बिराजा । मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा ॥

सिंहनाद करि बारहिं बारा । लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा ॥

उनका सोनेका-सा रंग है, शरीरपर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो। हनुमान्जीने बार-बार सिंहनाद करके कहा—मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ ॥ ४ ॥

सहित सहाय रावनहि मारी । आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ॥

जामवंत मैं पूछउँ तोही । उचित सिखावनु दीजहु मोही ॥

और सहायकोंसहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [कि मुझे क्या करना चाहिये] ॥ ५ ॥