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भारतकोश
श्रीरामचरितमानस

श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

पृष्ठ 728, कुल 1058 में से

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पृष्ठ 728

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  • रामचरितमानस *

तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी डाल दी, मानो अशोकने अङ्गारा दे दिया। [यह समझकर] सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया ॥ १२ ॥

तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम नाम अंकित अति सुंदर ॥ चकित चित्त मुदरी पहिचानी । हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ॥

तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं ॥ ११ ॥

जीति को सकड़ अजय रघुराई । माया तें अस्मि रचि नहीं जाई ॥ सीता मन बिचार कर नाना । मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥

[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है ? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती। सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय हनुमान्जी मधुर बचन बोले— ॥ २१ ॥

रामचंद्र गुन बरनैं लागा । सुनतहिं सीता कर दुख भागा ॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई । आदिहु तें सब कथा सुनाई ॥

वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके] सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह सुनायी ॥ ३१ ॥

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई । कही सो प्रगट होती किन भाई ॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ । फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ॥

[सीताजी बोलीं—] जिसने कानोंके लिये अमूर्तरूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई ! प्रकट क्यों नहीं होता ? तब हनुमान्जी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ ॥ ४ ॥

राम दूत मैं मातु जानकी । सत्य सपथ करुणानिधान की ॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी । दीन्हि राम तुम्ह कहैं सहिदानी ॥

[हनुमान्जीने कहा—] हे माता जानकी ! मैं श्रीरामजीका दूत हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता ! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है ॥ ५ ॥

नर बानरहि संग कहु कैसैं । कही कथा भड़ संगति जैसैं ॥

[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ ? तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही ॥ ६ ॥